काश, एक बहन होती
राखी आई, पर कुछ जीवन मे अधूरा है,
ना कोई आवाज़, ना कोई झगड़ा प्यारा है।
कलाई तो है, पर वो रक्षा का धागा नहीं,
जिसमें स्नेह भरा हो, वो नाता नहीं है।
बचपन से देखा है सबको एकसाथ हँसते,
बहनों को चिढ़ाते, फिर गले लग जाते।
मैं बस दूर खड़ा मुस्कुराया करता,
मन में एक करुणा सा सवाल दबाया…..
काश, एक चुलबुली सी बहन होती मेरी भी,
जो रूठती, लड़ती पर फिर सबसे ज्यादा चाहती।
जो कहती भैया, तुम दुनिया से लड़ लेना,
पर मुझे कभी तुम अकेला मत छोड़ देना।…..
आज जब सबके हाथों में राखियाँ होती हैं,
मेरे हाथों में बस यादें हैं कुछ चाहतें होती है,
कुछ अधूरी अनकही कहानियाँ होती हैं।
पर अब मैंने सीखा लिया है ये भी जीना,
दूसरों की बहनों में अपनी बहन को देख लेना।
उनकी रक्षा कर उस ख़ालीपन को भर लेना,
जो कभी एक रिश्ते के नाम था बहन उसको निभा लेना।
— रूपेश कुमार
