ग़ज़ल
चाल ज़माने वाली चलना सीख गए
हम भी झूठी बातें करना सीख गए
इश्क का हासिल हुआ हमें बस इतना सा
जीने की चाहत में मरना सीख गए
उनकी तरक्की रोक सका न कोई फिर
वक्त के सांचे में जो ढलना सीख गए
वो औरों से जलते हैं तो जलने दो
हम औरों की खातिर जलना सीख गए
घोंसला खाली हो गया उस दिन चिड़िया का
जिस दिन उसके बच्चे उड़ना सीख गए
— भरत मल्होत्रा
