बर्फ़ की चादर में छुपा ज़ख़्म
गुलमर्र्ग की वादी उस रोज़ सफ़ेद मख़मली चादर में लिपटी थी। देवदार के ऊँचे पेड़ ठंडी हवा में झूम रहे थे, डल झील पर धुंध का हल्का-सा परदा तना था। बर्फ़ के फाहे हवा में नाचते हुए उतरते, और सुबह की अज़ान की धीमी आवाज़ वादी को किसी पवित्र नज़्म में बदल देती।कॉलेज के दिनों में यूसुफ़ और माहिरा वहीं पहली बार मिले थे ,किताबों, कविताओं और ठंडी हवाओं की गवाही में मोहब्बत पनपी थी। माहिरा को उसकी शायरी बहुत पसंद थी। वह अकसर हंसते हुए कहती, “तुम्हारे अल्फ़ाज़ बर्फ़ जैसे हैं… बाहर से ठंडे, पर हाथ में आते ही पिघल जाते हैं।” यूसुफ़ को लगता था, ये रिश्ता पहाड़ों जैसा मजबूत है, जिसे कोई मौसम नहीं तोड़ सकता।मगर मौसम हमेशा एक से नहीं रहते। गर्मियों के अंत में, जब पहाड़ों पर धूप कम होने लगी, माहिरा ने कहा, “ज़िंदगी आगे बढ़नी है… कुछ सपनों का पीछा अकेले करना पड़ता है।” यूसुफ़ ने चुपचाप उसके शब्द अपने दिल में क़ैद कर लिए। उसके बाद वो चली गई।
कई महीने बीते। वादी पर बर्फ़ की पहली परत जमी, मगर यूसुफ़ के दिल पर इन्तज़ार की मोटी परत पहले से ही थी।हर दिन वह झील किनारे खड़ा बस यही सोचता, क्या मोहब्बत भी बर्फ़ जैसी होती है? दूर से चमकती है… छूते ही पिघल जाती है?इस सर्दी, एक दिन, बर्फ़ में ढकी पगडंडी पर उसने माहिरा को देखा। वही लाल फेरन, वही सफ़ेद शाल, लेकिन उसके साथ एक अजनबी था , निश्चिंत, मुस्कुराता, जिसकी उंगलियां माहिरा की उंगलियों में फंसी थीं।
यूसुफ़ कुछ समझ पाता, उससे पहले आसमान ने गड़गड़ाकर अपना रंग बदल लिया। पहाड़ों से नीचे उतरता गाढ़ा सफ़ेद तूफ़ान हर रास्ता, हर दरख़्त, हर इंसान को ढँकने लगा। हवा के साथ उड़ते बर्फ़ के तेज़ छींटे आंखों में चुभ रहे थे। माहिरा और उसका साथी पहले तो भागे, फिर तूफ़ान में उनकी परछाइयाँ धुंधली होती गईं।
यूसुफ़ चिल्लाया, दौड़ा… हवा ने उसकी आवाज़ को चीरकर दूर फेंक दिया। एक पल बाद, माहिरा किनारे की ओर लड़खड़ाते हुए बच निकली — लेकिन उसका साथी कहीं बर्फ़ में गुम हो गया। चीख़ें, आहटें, सब सफ़ेद खामोशी में समा गईं।जब तूफ़ान थमा, सिर्फ़ बर्फ़ बची थी… और खाई के पास फंसा उसका एक फटा हुआ दुपट्टा। वादी ने एक जान निगल ली थी — ठंडी, बेरहम ख़ामोशी के साथ।माहिरा की आंखों में अब सिर्फ़ खालीपन था। वह यूसुफ़ के करीब आई, होंठों पर कोई बेनाम सा शब्द लाने की कोशिश में बोली, “यूसुफ़…”लेकिन यूसुफ़ ने धीरे से अपनी उंगलियां उसके होंठों पर रख दीं। उसके स्पर्श में इलज़ाम नहीं था, बस एक टूटन थी — जैसे जमी हुई झील की सतह अचानक सी पड़ जाए। उसने देखा , ये वो माहिरा नहीं थी, जिसकी आंखों में कभी उसके लिए फूल खिलते थे। और वो भी अब वो यूसुफ़ नहीं रहा, जो उसकी तस्वीर अपनी कविताओं में छुपा कर रखता था।
सुबह होते-होते, यूसुफ़ बिना किसी को बताए, वादी की किसी पगडंडी में गुम हो चुका था। बर्फ़ पर उसके कदमों के निशान थोड़ी दूर तक चले, फिर हवा ने उन्हें ढँक दिया ,जैसे वो कभी यहां था ही नहीं।
माहिरा बदहवास थी , बर्फ़बारी में इधर-उधर घूमती, तेज़ सांसों के बीच, जाने किसकी तलाश में थी। क्या वो यूसुफ़ को ढूंढ रही थी, जो अब उसके अतीत में दब चुका था? या उस नए साथी को, जो कल के हादसे में बर्फ़ के नीचे कहीं हमेशा के लिए सो गया था?
वादियों का आसमान सफ़ेद और चुप था। दूर देवदारों के बीच से हवा गुजर रही थी, उसके सुर किसी अधूरी कविता की तरह सिसक रहे थे। हर गिरते फाहे के साथ ये यक़ीन गहरा होता गया , कुछ तलाशें कभी मुकम्मल नहीं होतीं, और कुछ मोहब्बतें बर्फ़ की चादर में ऐसे दफ़न हो जाती हैं, कि उनका नाम भी वक़्त नहीं ढूंढ़ पाता।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज़
