ग़ज़ल
ज़ालिम के इंतज़ामात सारे टूट जाते हैं
लोग जब ठान लेते हैं तो पिंजरे टूट जाते हैं
मौज में है हवा अपनी उसे मालूम ही क्या है
कि उसकी तेज़ रफ्तारी से पौधे टूट जाते हैं
साथ अपने बहा ले जाते हैं ता उम्र की मेहनत
बारिश में जो नदियों के किनारे टूट जाते हैं
गरीबी, भूख, बेकारी, बेवफाई ओ रुसवाई
तुम्हें क्या क्या बताऊं लोग कैसे टूट जाते हैं
जवां बेटा ये समझेगा मगर अपने बुढ़ापे में
कि बेटे को जवां करने में कंधे टूट जाते हैं
— भरत मल्होत्रा
