स्वास्थ्य

पेट के रोगों का इलाज

मेरे एक घनिष्ट फेसबुक मित्र ने यह पोस्ट आज ही लगायी है। वे अमरीका में रहते हैं, लेकिन उनके सम्बंधी भारत में ही हैं। उनकी साली को बाहर का अर्थात् होटलों का खाना बहुत अच्छा लगता था और उसकी लत लग गयी थी। इससे उनके पेट में दर्द होने लगा। पेट दर्द के लिए उनको दिल्ली के दो नामी अर्थात् महँगे अस्पतालों में भर्ती कराया गया। परन्तु उन अस्पतालों के ”बड़े-बड़े“ डॉक्टर उनका पेट दर्द सही नहीं कर सके। इलाज में लाखों रुपये व्यय हुए, परन्तु अन्ततः उनकी साली जी को अपने प्राण त्यागने पड़े।

इस भयंकर घटना से कुछ बातें फिर स्पष्ट होती हैं, जिनकी चर्चा मैं प्रायः करता रहता हूँ।

  1. बाहर का खाना अर्थात् संकट बुलाना। इसका पहला प्रभाव पेट पर ही पड़ता है अर्थात् पाचन क्रिया मंद होते-होते समाप्त हो जाती है। मल विसर्जन क्रिया भी उसके साथ-साथ मंद हो जाती है और शरीर अनेक रोगों का घर बन जाता है। इसलिए हमें बाहर का भोजन करने से यथासम्भव बचना ही चाहिए। महीने-पन्द्रह दिन में एकाध बार बाहर खा लेना तो चलेगा, परन्तु इससे अधिक नहीं। जो इसका पालन नहीं करते या नहीं करना चाहते, उनको कुपरिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  2. ऐलोपैथी में पेट दर्द और पेट के अन्य रोगों का कोई इलाज नहीं है। वे रोग को जाने और उसका असली कारण पहचाने बिना ही अँधेरे में तीर मारते रहते हैं। इसका कुपरिणाम अन्ततः रोगी और उनके घरवालों को भुगतना पड़ता है। अपनी गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आप रोग मुक्त हो जायेंगे। इसके विपरीत यह देखा गया है कि बिना पार्श्वप्रभावों की चिन्ता किये तेज और महँगी दवायें देने से रोगी की जीवनीशक्ति पूरी तरह नष्ट हो जाती है।

वास्तव में पेट दर्द और पेट के सभी रोगों का रामबाण इलाज प्राकृतिक चिकित्सा में है। मैंने केवल घरेलू उपायों से ऐसे अनेक रोगियों को ठीक किया है जो वर्षों से दवायें खाते हुए भी रोगमुक्त नहीं हो रहे थे और उनके कष्ट बढ़ते ही जा रहे थे।

सबके लाभ के लिए बता दूँ कि पेट के सभी रोगों पर लागू होने वाला रामबाण उपचार यह है कि प्रातः शौच के बाद पेड़ू (नाभि से नीचे पेट का आधा भाग) पर 5 मिनट तक बर्फ लगाइए, जिससे कि वह भाग अच्छी तरह ठंडा हो जाये। फिर इसके तुरन्त बाद दो किमी टहलिए, जिससे शरीर में गर्मी आ जाये। यह क्रिया प्रतिदिन लगातार करते रहने से पेट के सभी रोग कुछ ही दिनों में दूर हो जाते हैं। इसके साथ सात्विक आहार-विहार करना अनिवार्य है।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 3, सं. 2082 वि. (12 अगस्त, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com