गीत/नवगीत

इस देश में रहते हैं

हम रूप अनोखे धर कर, कई भेष में रहते हैं
हैं ये अभिमान कि हमको , इस देश में रहते हैं ।

रघुकुल की रीत निभाकर, जहाँ राम ने अलख जगाई
गीता का ज्ञान बहाकर, घनश्याम ने बंसी बजायी
संसार के सुख की खातिर, गौतम ने वैभव त्यागा
सुन महावीर की बानी, हिंसा का दानव भागा
हम नानक की संताने, गुरू आदेश में रहते हैं,
हैं ये अभिमान कि हमको, इस देश में रहते हैं ।1।

है मेरे वतन की माटी, मुझको तो जान से प्यारी
इस माटी के कण-कण में, बसती है शान हमारी
उगते सूरज के संग-संग, करते इसका अभिनंदन
हम धरे भाल इसको तो, ये महक उठे बन चंदन
हम प्राण न्यौछावर करने, के आदेश में रहते हैं
हैं ये अभिमान कि हमको, इस देश में रहते हैं ।2।

हमने दुश्मन के घर में, है घुसकर उसको मारा
नहीं कभी पीठ दिखलाई , हर बार उसे ललकारा
हम अभिमन्यु के वंशज, नहीं मरने से डरते हैं
हम स्वाभिमान की खातिर, मृत्यु को भी वरते हैं
हम रणवीरों-रणधीरों के, परिवेश में रहते हैं
हैं ये अभिमान कि हमको, इस देश में रहते हैं ।3।

— शरद सुनेरी