उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 18)

श्री राम का पता जानकर और मुनि की आज्ञा पाकर भरत जी ने अपनी सेना सहित सभी को चलने का आदेश दिया। चलने की तैयारी करने का आदेश वे पहले ही दे चुके थे। शीघ्र ही वे सभी दक्षिण दिशा में चलकर यमुना नदी के किनारे पहुँच गये। जैसा कि ऋषि भरद्वाज ने उनको बताया था, यमुना वहाँ पर अधिक गहरी नहीं थी, परन्तु उसका जल बड़े वेग से बह रहा था। उसको पार करने में हाथी बहुत उपयोगी सिद्ध हुए। अधिकांश नागरिकों और सेना को हाथियों पर बैठाकर यमुना पार उतार दिया गया। कुछ घोड़े आदि वाहन भी हाथियों के सहारे ही नदी पार कर गये।

यमुना नदी पार करने में बहुत समय लग गया था, इसलिए सभी तेजी से फिर दक्षिण दिशा में जाने वाले मार्ग पर चलने लगे, जैसा कि ऋषि ने बताया था। सभी अपने-अपने वाहनों पर सवार थे। कुछ सैनिक पैदल ही चले जा रहे थे। उनके चलने से बहुत कोलाहल हो रहा था, जिससे भयभीत होकर वन के पशु हाथी, रीछ, मृग, सियार आदि इधर-उधर भागने लगे। उनको भागते देखकर यात्रा में सम्मिलित हाथी और घोड़े आनन्दित हुए। जैसे-जैसे वे चित्रकूट के निकट पहुँचते जा रहे थे, वैसे-वैसे वन घना होता जा रहा था और मार्ग सँकरा होता जा रहा था। फिर भी वे बिना रुके चलते गये, क्योंकि वे अँधेरा होने से पूर्व ही अपने गंतव्य पर पहुँच जाना चाहते थे।

सेना सहित अपने दल से घिरे हुए भरत बहुत आनन्द के साथ यात्रा कर रहे थे। उनकी विशाल सेना ने बहुत वन क्षेत्र को ढक दिया था। बहुत दूर तक चलने के बाद उनको दो मार्ग बायें-दायें जाते हुए मिले। ऋषि भरद्वाज के कथन के अनुसार वे बायें मार्ग से आगे बढ़े। दिनभर चलने के बाद वे चित्रकूट पर्वत के निकट एक सुन्दर हरे-भरे वन में पहुँच गये। शीघ्र ही उनको मंदाकिनी नदी निकट ही होने का आभास होने लगा।

यह देखकर भरत जी ने अपने साथ चल रहे गुरु वशिष्ठ जी से कहा- ”गुरुदेव! लगता है कि ऋषि भरद्वाज ने हमें जहाँ जाने का आदेश दिया था, हम उस स्थान के निकट आ पहुँचे हैं। प्रतीत होता है कि यही चित्रकूट पर्वत है और निकट ही मंदाकिनी बह रही है।“ वशिष्ठ जी ने उत्तर दिया- ”मुझे भी ऐसा ही प्रतीत होता है।“
फिर भरत जी शत्रुघ्न जी से कहने लगे- ”शत्रुघ्न! देखो, इस पर्वत की घाटी में जो सुन्दर-सा देश बसा हुआ है, वह किन्नरों का देश लगता है। हमारी सेना के घोड़ों की टापों से डरकर भागते हुए मृग झुड के झुंड उसी ओर भागे जा रहे हैं। यह वन पहले जनशून्य था, परन्तु हमारे साथ आये हुए लोगों के कारण किसी बसे हुए नगर जैसा लग रहा है। मुझे यहाँ अयोध्या नगरी के समान लग रहा है।

हमारी सेना से भयभीत होकर उड़ते हुए मोर कितने सुन्दर लग रहे हैं। इसी प्रकार अन्य पक्षी भी अपने आवासों की ओर उड़ते हुए भागे जा रहे हैं। इस वन में मृगियों के साथ विचरते हुए मृग बहुत सुन्दर लगते हैं। यह वन प्रदेश बड़ा शुभ है। यहाँ अनेक तपस्वी साधना करते हुए निवास करते हैं।“ इस प्रकार बातें करते हुए वे मंदाकिनी नदी के पास पहुँच गये।

मन्दाकिनी नदी के निकट पहुँचकर भरत जी ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि आस-पास कोई आश्रम खोजो, जिससे श्री राम का पता पाया जा सके। आदेश पाते ही शूरवीर सैनिक वन में इधर-उधर घुस गये और आश्रमों की टोह लेने लगे। कुछ सैनिक ऊँचे वृक्षों पर चढ़कर देखने लगे। उन्हें एक स्थान पर धुआँ उठता हुआ दिखाई दिया, इससे उन्होंने अनुमान लगाया कि वहाँ अवश्य किसी तपस्वी का निवास होगा। यह देखकर उन्होंने तुरन्त भरत जी को इसकी सूचना दी।

किसी आश्रम का स्थान जानकर भरत जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सभी लोगों को वहीं पर रोक दिया और कहा कि जब तक मेरा आदेश न मिले, तब तक कोई आगे नहीं बढ़ेगा। फिर वे स्वयं और शत्रुघ्न अपने दो मंत्रियों सुमन्त्र जी तथा धृति को साथ लेकर उस स्थान की ओर पैदल ही चलने लगे, जहाँ सैनिकों ने धुआँ उठने की सूचना दी थी। वहाँ से मन्दाकिनी नदी भी अधिक दूर नहीं थी।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 6, सं. 2082 वि. (15 अगस्त, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com