कहानी

मैं अपनी ख़ुशी की खातिर इन ज़िम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकती

कश्मीर की वादियों में उस सुबह झेलम की धारा कलकल करती बह रही थी। डल झील पर हल्की धुंध तैर रही थी और चिनार के पत्तों की सरसराहट हवा में गूँज रही थी। इन्हीं खूबसूरत नज़ारों के बीच आरमान रोज़ाना कॉलेज जाया करता था। उसके लिए कॉलेज केवल पढ़ाई की जगह नहीं था, बल्कि वहाँ उसकी एक उम्मीद बसती थी,इनाया।सफेद दुपट्टे में लिपटी इनाया की आँखों में झील जैसी गहराई थी। चाल-ढाल में सादगी और चेहरे पर ऐसी हया कि देखने वाला नज़र झुका ले। मगर उसकी इस मासूमियत के पीछे ज़िम्मेदारियों का पहाड़ छिपा था। बीमार पिता, बहनों की पढ़ाई और उनके निकाह का बोझ, और भाई की बेरुखी—सब कुछ उसके छोटे से कंधों पर था।कक्षा में जब वह किताबों में डूबी रहती, आरमान की नज़रें उसी पर ठहर जाया करतीं। कई बार उनकी आँखें मिलीं, मगर फिर इनाया झट से नज़रें झुका लेती। उसके दिल की किताब में भी शायद वही हर्फ़ लिखे थे, जिन्हें आरमान अपनी निगाहों से पढ़ना चाहता था।एक दिन लाइब्रेरी में दोनों एक ही किताब के लिए हाथ बढ़ा बैठे। खामोशी और गहरी हो गई। आरमान ने हिम्मत करके कहा, “इनाया… अब मैं और नहीं छिपा सकता। मेरी दुआओं का नाम आप हैं। अगर आप चाहें तो यह मोहब्बत नज़रें चुराने तक सीमित न रहे, बल्कि ज़िन्दगी की रहगुज़र तक पहुँच जाए।” इनाया की आँखें भीग गईं। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “आरमान… आप नेक हैं, मगर मैं अपनी मोहब्बत को अपने फ़र्ज़ के आगे झुका नहीं सकती। वालिद बीमार हैं, घर का बोझ मुझ पर है, दो बहनों की शादियों की फिक्र है। मैं अपनी खुशी की खातिर इन जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकती।”उस दिन आरमान का दिल टूट गया, मगर उसने उसके फैसले की इज़्ज़त की। उसने बस इतना कहा, “तो मेरी मोहब्बत अब आपकी दुआ बनकर रहेगी। मैं आपको मजबूर नहीं करूंगा।”

वक़्त का दरिया तेज़ी से बहा। इनाया ने अपने वालिद की सेवा की, बहनों की शादियाँ कराई, नौकरी की थकान और घर की जिम्मेदारियों को उठाते-उठाते अपनी जवानी खो दी। भाई अपनी शादी के बाद अलग हो गया और फिर एक दिन उसके वालिद भी अल्लाह को प्यारे हो गए। घर की सारी रौनक बुझ गई। इनाया के हिस्से में रह गई सिर्फ़ तन्हाइयों से भरी लंबी रातें और भारी खामोशियाँ। वह अक्सर खिड़की से बाहर दूर बर्फ़ीली वादियों को देखती और दिल से एक आह निकलती, “काश मैंने उस दिन आरमान का हाथ थाम लिया होता तो आज इतना अकेला न होती।”बरसों बाद, मोहल्ले की एक शादी में अचानक किस्मत ने उन्हें फिर मिला दिया। दोनों सफेद बालों और झुर्रियों के साथ खड़े थे, मगर दिल अब भी उतने ही जवां थे। आँखें मिलते ही सब पुराने लम्हे ताज़ा हो गए। आरमान ने कंपती आवाज़ में कहा, “इनाया… हमने जवानी खो दी, मगर मोहब्बत को कभी दिल से नहीं निकाल पाए। क्या अब भी हमें बचे हुए दिन साथ बिताने का हक़ नहीं है?” इनाया की आँखों से आँसू बह निकले। उसने धीमे स्वर में कहा, “आरमान, अगर मोहब्बत इतनी सब्र वाली रही, तो इसे मुकम्मल होना ही चाहिए।”सादगी और दुआओं के साए में उनका निकाह हो गया। अब जब लोग उन्हें देखते तो कहते, “यही मोहब्बत है, जो वक़्त और जुदाई के हर इम्तिहान के बाद भी ज़िन्दा रही।” डल झील की ठंडी हवा, चिनार के पत्तों की सरसराहट और कश्मीर की वादियाँ अब उनकी मोहब्बत की गवाह बन गईं।शाम ढलते ही झील के किनारे लकड़ी की बेंच पर दोनों बैठते। उनके सफेद बाल सुनहरी धूप में ऐसे चमकते जैसे चांदी के तार। उंगलियों में कंपन था, मगर वे एक-दूसरे का हाथ कस कर थामे रहते। इनाया मुस्कुराकर कहती, “आरमान, हमारी मोहब्बत ने जवानी को कभी देखा ही नहीं, मगर देखिए, इस बुढ़ापे में ये कितना सुकून दे रही है।” आरमान जवाब देता, “इनाया, लोग कहते हैं मोहब्बत वक़्त से हार जाती है, लेकिन हमारी मोहब्बत साबित करती है कि सच्चा इश्क़ वक़्त के साथ और गहरा हो जाता है। ये झील, ये वादियाँ, ये पत्ते सब हमारे किस्से के गवाह रहेंगे।”उनकी आँखों में आँसू थे, मगर चेहरों पर सुकून की तस्वीर। और उनकी ये कहानी किसी किनारे पर जाकर खत्म नहीं हुई, बल्कि एक ज़िंदा मिसाल बन गई,वादियों की उन ठंडी हवाओं में घुली हुई मोहब्बत की मिसाल, जो आने वाली नस्लों की दुआओं का हिस्सा बनकर हमेशा जिंदा रहेगी।


— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।