लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 19)
श्री राम को चित्रकूट पर्वत बहुत प्रिय लगता था। वहाँ रहते हुए उन्हें अनेक दिन हो गये थे। एक दिन वे सीता जी और अपने मन को बहलाने के लिए उन्हें चित्रकूट की शोभा दिखाने लगे। वे बोले- “भद्रे! मैं अपने राज्य से दूर हूँ और अपने परिवार से भी दूर हो गया हूँ, परन्तु इस रमणीक पर्वत को देखकर मैं राज्य खोने और सुहृदों से दूर होने का दुःख भूल जाता हूँ। ये पर्वत शिखर विभिन्न धातुओं से भरे हुए हैं। यहाँ बहुत से पक्षी और वनपशु विचरण करते हैं। इन पर्वत शिखरों से विभूषित हुआ चित्रकूट बहुत शोभा पा रहा है।
इस पर्वत पर अनेक फल और फूलों से लदे हुए वृक्षों का बाहुल्य है। आम, जामुन, बेल, कटहल, कदम्ब आदि फल वाले वृक्ष यहाँ बड़ी संख्या में हैं। इन शिखरों से अनेक झरने गिरते हैं और पानी के अन्य स्रोत निरन्तर बहते रहते हैं। मेरा मन इन पर्वत शिखरों पर लग गया है। यदि मैं तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ अनेक वर्षों तक भी यहाँ रहूँ, तो भी मुझे नगरत्याग का कोई शोक नहीं होगा। इन रमणीय शैल शिखरों पर किन्नरों के जोड़े प्रेमपूर्वक आनन्दित होकर टहल रहे हैं। बहुत से फूलों और फलों से भरे हुए तथा अनेक प्रकार के पक्षियों से सेवित इस पर्वत शिखर पर मेरा मन बहुत आनन्दित होता है।
प्रिये! इन वनवास से मुझे दो लाभ हुए हैं- एक, धर्म के अनुसार मैंने अपने पिता के आदेश का पालन किया है और दो, प्रिय भाई भरत को राज्य मिल गया है। वैदेही! क्या तुम्हें इस चित्रकूट पर्वत पर मेरे साथ रहने से आनन्द की अनुभूति होती है? यदि अपने नियमों का पालन करते हुए मैं तुम्हारे और भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ चौदह वर्ष तक रह सका, तो मुझे अत्यन्त आनन्द होगा।“
श्री राम वन में रहते हुए अयोध्या को बहुत याद करते थे और चित्रकूट की शोभा देखकर उसे भुलाने की कोशिश करते थे। चित्रकूट पर्वत का अनेक प्रकार से वर्णन करने के बाद श्री राम ने सीता जी को मंदाकिनी नदी के दर्शन कराये और उसकी शोभा बताने लगे- “प्रिये! अब मंदाकिनी नदी की शोभा देखो। हंस और सारस पक्षी इसमें क्रीड़ा करते हैं। इसके किनारों पर सुंदर फूलों के पौधे इसकी शोभा बढ़ाते हैं। उनसे गिरे हुए ढेर सारे फूल किनारों पर बिखरकर उनको और भी सुन्दर बना रहे हैं। यद्यपि हिरणों के झुंड पानी पीकर इसे गँदला कर गये हैं, फिर भी इसके रमणीय घाट मुझे आनन्द दे रहे हैं। सुन्दरी! वह देखो, मीठी बोली बोलने वाले चकवे-चकवी कलरव करते हुए किनारों पर पंक्तिबद्ध आकर बैठ गये हैं और शोभा पा रहे हैं।
सीते! तुम मंदाकिनी नदी में उतरकर स्नान करते हुए क्रीड़ा करो। तुम यहाँ के निवासी मनुष्यों को अवधनिवासी समझो, चित्रकूट को ही अयोध्या मानो और मंदाकिनी को ही सरयू नदी मानकर आनन्द लो। धर्मात्मा लक्ष्मण सदा मेरे मन के अनुकूल चलते हैं और मेरी आज्ञा का पालन करते हैं, इससे मुझे बहुत प्रसन्नता होती है।
वह देखो! जटा, मृगचर्म और वल्कल धारण करने वाले अनेक तपस्वी ऋषि उपयुक्त समय पर आकर इस नदी में स्नान कर रहे हैं। कई मुनि दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्य देव का उपस्थान कर रहे हैं। वायु से उड़कर आए हुए फूल और पत्ते इस नदी के तटों पर बिखरकर शोभा पा रहे हैं।
कल्याणी! यहाँ प्रतिदिन चित्रकूट और मंदाकिनी का दर्शन करना अयोध्या में निवास करने से अधिक सुखकर है। चलो, हम दोनों भी इस नदी में स्नान कर लें। तुम्हारे साथ तीनों काल यहाँ स्नान करके मधुर फल-मूल का आहार करता हुआ, मैं न तो अयोध्या जाने की इच्छा रखता हूँ और न राज्य पाने की।”
जब श्री राम सीता जी को चित्रकूट पर्वत और मंदाकिनी नदी की शोभा दिखा रहे थे और उनके साथ एक शिला पर बैठे हुए फल-मूल का सेवन कर रहे थे, तभी उधर आने वाली भरत जी की सेना की धूल आकाश में उड़ने लगी और कोलाहल होने लगा। उनके कारण अनेक वनपशु भयभीत होकर इधर-उधर दौड़ने लगे।
कोलाहल सुनकर श्री राम ने लक्ष्मण जी से कहा- “लक्ष्मण! यह कैसा कोलाहल हो रहा है? पता लगाओ कि हाथियों के झुंड और मृग आदि पशु क्यों भयातुर होकर दौड़ रहे हैं।”
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 8, सं. 2082 वि. (17 अगस्त, 2025)
