कविता

बचपन की बारीश , बम की वर्षा

बारिश का मौसम ,
लगता था सुहाना।

भीगें -भीगें कोमल पत्तों पर,
छोटी – छोटी बूंँदों का गिरना,

खींचती हैं मन को ,
बचपन की यादें ,

कागज की कश्ती ,
बरखा का पानी ।

फूलों पर रंग – बिरंगी,
तितलियों का बैठना,

पंख हिला – हिला कर उड़ना ,
लगती थीं कितनी सुंदर।

कहांँ गया वे दिन ,
कैसा है यह दौर ?

भीगा – भीगा चित्त मोरा ,
इधर – उधर भटक रहा,

न कोई ठौर – ठिकाना,
विश्व मे युद्ध हो रहा,

मृतप्राय है संवेदना,
मानव अस्तित्व खतरे में,

मिसाइल ड्रोन की वर्षा हो रही ,
मुश्किल है अब बच पाना ,

जागो रे ! चेतना !
देखो ! चीख पुकार रहे हैं,

हाल बेहाल , फटे हाल है,
दया करो ! जन निर्दोष हैं,

जाओ! इन्हें शांति का पाठ पढ़ा दो!
बम की वर्षा हो रही , उन्हें अब रोक दो!

सौहार्द , सौमनस्य की भावना हो,
प्रार्थना है – जग में अमन – चैन हो।

— चेतना सिंह

चेतना सिंह 'चितेरी'

मोबाइल नंबर _ 8005313636 पता_ A—2—130, बद्री हाउसिंग स्कीम न्यू मेंहदौरी कॉलोनी तेलियरगंज, प्रयागराज पिन कोड —211004