बचपन की बारीश , बम की वर्षा
बारिश का मौसम ,
लगता था सुहाना।
भीगें -भीगें कोमल पत्तों पर,
छोटी – छोटी बूंँदों का गिरना,
खींचती हैं मन को ,
बचपन की यादें ,
कागज की कश्ती ,
बरखा का पानी ।
फूलों पर रंग – बिरंगी,
तितलियों का बैठना,
पंख हिला – हिला कर उड़ना ,
लगती थीं कितनी सुंदर।
कहांँ गया वे दिन ,
कैसा है यह दौर ?
भीगा – भीगा चित्त मोरा ,
इधर – उधर भटक रहा,
न कोई ठौर – ठिकाना,
विश्व मे युद्ध हो रहा,
मृतप्राय है संवेदना,
मानव अस्तित्व खतरे में,
मिसाइल ड्रोन की वर्षा हो रही ,
मुश्किल है अब बच पाना ,
जागो रे ! चेतना !
देखो ! चीख पुकार रहे हैं,
हाल बेहाल , फटे हाल है,
दया करो ! जन निर्दोष हैं,
जाओ! इन्हें शांति का पाठ पढ़ा दो!
बम की वर्षा हो रही , उन्हें अब रोक दो!
सौहार्द , सौमनस्य की भावना हो,
प्रार्थना है – जग में अमन – चैन हो।
— चेतना सिंह
