बेहिसाब तबाही त्राहि-त्राहि
आसमान से ‘बेहिसाब’ बरस रही तबाही,
कहां जाएं इंसान कर रहा हैं त्राहि-त्राहि।
इधर कुआं-उधर खाई ये तूने क्यों बनाई,
मझधार में छोड़कर क्यों की जग हँसाई।
कौन कहां खोया किसने ली कहाँ पनाह,
दूर-दूर तक किसी का न था कोई गुनाह।
यहां से वहां तक सभी हो गए हैं लथपथ,
पांव में पड़ रहे छालें कैसे चले अग्निपथ।
इतना क्रोध न करों डूबे आकंठ गले तक,
ये पत्थर भी लेने लगे दौड़कर जान तक।
निगल लिए पहाड़ तो नहीं बचे प्राण तक,
रखवालें भी बेबस हुवें ना रहीं आन तक।
— संजय एम तराणेकर
