कविता

एकांत

कभी एकांत में कहाँ रह पाती हूँ,
जैसे गर्भ में शिशु पलता है
माँ की साँसों के सहारे,
वैसे ही तुम धड़कते रहते हो
मेरे अंतर में निरंतर।

इसका समय केवल नौ माह का नहीं,
यह तो ताउम्र का है
अविरल, अनवरत, अनन्त।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com