ग़ज़ल
मैंने तनहाई में किस किस को पुकारा मत पूछ
किस तरह हिज़्र का मौसम ये गुज़ारा मत पूछ
जिसे सुनना है पहली बार में सुन लेता है
नहीं दोहराऊंगा तू मुझसे दोबारा मत पूछ
राज़ की बात है ये राज़ ही रहने दे इसे
किस जानिब था उस हसीं का इशारा मत पूछ
मैंने रो रो के खैर मांगी थी जिसकी रब से
वही कहता है मुझे हाल हमारा मत पूछ
तुझे ही शौक था दरिया की सैर तो अब
सफर का लुत्फ़ ले किधर है किनारा मत पूछ
— भरत मल्होत्रा
