कृष्ण की व्यथा
कहने को तो नागर ने सब कुछ रचा,
पर मोहन के जैसा दुख किसने सहा,
जन्म लेते ही छूटे निज मात-पिता,
इससे बढ़कर किसी की क्या होगी व्यथा।
छूट गईं मथुरा, छूटी द्वारका,
बंसी छूटी, छूटे सब सखा,
जो बसती रही, हृदय में सदा,
छूट गई बरसाने की वो राधा।
सब ने तो सुनी बंसी की धुन,
पीड़ा को सिर्फ नटवर ने चखा।
कहने को तो नटवर ने…….
— सविता सिंह मीरा
