राह के रोड़े
मत बनो बेटियों के राह के रोड़े,
पत्थर को तराशने की खूबियां भले है तुममें
पर पुत्रियों का साथ देने तक्षण क्यों नहीं दौड़े,
यत्र तत्र सर्वत्र
बेटियां किलोल मार रही,
शिक्षा अपनाते हुए
सुखद भविष्य पुकार रही,
जरा आंख खोल कर देखो
जमीन,आसमान तो क्या
अंतरिक्ष में झंडे गाड़ रही है,
मगर लोगों के सोच की विडंबना देखिए,
गर्भ में हत्या न हो हमारी कह
बेटियां कोख से पुकार रही है,
हां कुछ तो बदला है जमाना,
वजूद बढ़ी है बेटियों की लेकिन
अभी भी मर रही है वो रोजाना,
कभी भ्रूण हत्या तो कभी दहेज हत्या,
कभी ऑनर किलिंग तो कभी बलात्कार,
क्यों नहीं सुनाई दे रही उनकी चीत्कार,
अपनी बच्चियों पर हो रहे अत्याचार के लिए
दोषी हर मां बाप है,
नवरात्रि पर नौ बेटी खोजना
भूल जाते क्या नहीं ज्ञात है,
ऊपर से बेटों को संस्कार न देना,
खुले सांड की तरह समाज में छोड़ देना,
क्या अब भी कहें कि कोई और दोषी?
सबसे बड़ा दोषी वो है जो
बेटों की काली करतूतों पर
ओढ़ लेते हैं खामोशी।
— राजेन्द्र लाहिरी
