संस्मरण

5 पैसे से लेकर, हजार, दो हजार तक का सफर भी लगे कम 

आज भी याद है मुझे एक समय था जब मैं स्कूल जाती थी तब मुझे पांच पैसे मिलते थे अरे जानते हो पांच पैसे कौन से? 

अरे वही पांच पैसे जो चौरस होते थे और एलुमिनियम धातु से निर्मित होते थे। परंतु आज के बच्चों को कहां पता होगा उन्होंने ने तो देखे भी नहीं होंगे पांच पैसे, दस पैसे, बीस पैसे के सिक्के जो एलुमिनियम धातु से बने थे। हॉं उन बच्चों ने जरूर सिर्फ देखे होंगे जिनके घर के बड़ो ने कुछ इक्का-दुक्का सिक्के निशानी या पुरानी याददाश्त को जिंदा रखने के लिये जमा रखे होंगे या तो सिर्फ कुछ म्यूज़ियम में दिखे होंगे। 

पता है पाठकों मैंने क्यों कहा सिर्फ कुछ देखे होंगे बच्चों ने एलुमिनियम के बने सम्मानित पांच, दस, बीस के सिक्के? 

क्योंकि अब ये सिक्के चलन में ही नहीं है। अर्थात ये सिक्के अगर अब किसी के पास होंगे भी तो वो सिर्फ एक धातु के टुकड़े के रूप में होंगे उनकी कीमत आज वर्तमान में आर्थिक दृष्टिकोण से शुन्य है। 

अरे मैं तो भुल ही गई थी की मैं कहां थी, हॉं याद आया मैं बता रही थी की जब मैं बहुत छोटी थी तो मात्र पांच पैसे का सिक्का मिलता था मुझे मम्मी से रोज़ और उस समय वो पांच पैसे का भी सिक्का देख कितना खुश होते थे हम भाई-बहन, 

पता है क्यों? क्यों कि उस समय पांच पैसे की भी बहुत कीमत होती थी। पांच पैसे मैं दो टॉफियां जो आती थी। तोश, अरे वही तोश जो हम अक्सर गर्मागर्म चाय में डुबो कर खाते हैं वो पता मात्र दस पैसे का एक आता था मतलब 1 अगर कोई एक रूपये के ले तो उसे अच्छे बड़े-बड़े दस तोश मिल जाते थे। आज वही तोश, अरे पहले के तोश की आधी साइज़ मतलब पहले बड़े-बड़े तोश मिलते थे, इंसान चाय के दो या तीन खा ले तो नाश्ते की ही जरूरत नहीं लगे। परंतु अब तो उस तोश के भी आधे साइज़ के तोश आते तीन भी खा लो तो नाश्ते की जरूरत लगती जल्द ही। कहने का मतलब है दस रूपये में दस तोश मिलते आज कल पैकेट में। 

अरे याद है तब तो दस पैसे में हम दस पोंगे वाली तली कचरी लेते थे। बहुत जगह उसे फिंगर भी बोलते थे दस पैसे की दस ली, दसों उंगलियों में एक-एक फिट की और घूमते-घूमते दसों उंगलियों में लगी फिंगर कर एक-एक करके खाकर जो रसो स्वाद लेते थे कचरी का आ हा हा …. सोच-सोच के ही मुंह में पानी आ गया मेरे तो, पर अब वही फिंगर वाली कचरी मिलती तो हैं, पर दस रूपए की दस उफ्फ़ कहां गया वो समय। 

बताइए ना आप सभी पाठकों क्या मैंने कुछ ग़लत कहा- मतलब जो शीर्षक दिया अपनी बीती यादों को की पांच पैसे से एक हज़ार, दो हजार तक का सफर भी लगे बहुत कम, क्या अतिशयोक्ति है शब्दों मे मेरे ? नहीं! बिल्कुल नहीं। जब पांच पैसे मात्र मिलते थे , फिर दस पैसे मिले, फिर बीस, चवन्नी, अट्ठनी, बारह आना, बस बढ़ता गया जेब खर्चा और बढ़ते-बढ़ते अब तो शादी भी हो गई और मेरे अपने बच्चे भी। वो पांच पैसे के सफ़र से लेकर आज छियालिस साल तक की उम्र के सफर के भीतर तो आज उम्र के साथ-साथ जेब ख़र्च के लिये पैसे की मांग भी बढ़ती गयी परंतु हुआ क्या आज ये पैसे भी जैसे बहुत ही कम लग रहे। क्यों आखिर ये मेरी समझ के परे है? क्या महंगाई बढ़ गई? क्या रूपये की कीमत घट गई या बढ़ गई? या हमारी जरूरतें बहुत अधिक बढ़ गई है? बताइए मेरे मन में उठे हर एक सवाल का जवाब मेरे ही पास नहीं है, तो आप पाठक भी भला कैसे जवाब दे पाएंगे मेरे सवालों का। 

आज वर्तमान में महंगाई के साथ-साथ बच्चों के जेब खर्च ही इतने बढ़ गये हैं की एक आम इंसान तो सिर्फ अपनी जिम्मेदारी के तले दबता ही चला जाता है और दब-दब कर इतना दब जाता की वो स्वयं के लिये जीना ही भूल जाता है। 

पहले जहां हम एक दिन में एक रूपये मिलते ही इतना खुश हो जाते थे, आज ठीक उसी के विपरीत बच्चे तो एक दिन में पचास या सौ रूपए दे दो तो भी इनको ये पैसे पानी की एक बूंद के समान ही लगेंगे। अब बताओ भला कहां वो समय था और कहां आज का समय। जितना पैसा हाथ में आए वो भी कम लगे। बचपन से लेकर देखा था अपने पापा को नौकरी करते हुए बहुत कम पगार थी और मम्मी ने इतने कम पैसों में घर कैसे चलाया ये सीखा था। आज उन्हीं को देख-देख बजट अनुसार अपने परिवार को साथ ले चलाती। अपने बच्चों को भी यही सिखाती मुट्ठी बंद रखोगे तो भविष्य संवरेगा, लोग सम्मान देंगे यही मुट्ठी खोल दोगे तो आपको कोई नहीं पूछेगा।

यही इस संसार का नियम है। 

— वीना तन्वी

वीना आडवाणी तन्वी

गृहिणी साझा पुस्तक..Parents our life Memory लाकडाऊन के सकारात्मक प्रभाव दर्द-ए शायरा अवार्ड महफिल के सितारे त्रिवेणी काव्य शायरा अवार्ड प्रादेशिक समाचार पत्र 2020 का व्दितीय अवार्ड सर्वश्रेष्ठ रचनाकार अवार्ड भारतीय अखिल साहित्यिक हिन्दी संस्था मे हो रही प्रतियोगिता मे लगातार सात बार प्रथम स्थान प्राप्त।। आदि कई उपलबधियों से सम्मानित