ग़ज़ल
अब न होंगी उतार की बातें।
सिर्फ़ होंगी उभार की बातें।
तिफ्लकी बातकरचुके जीभर
अब करो शह सवार की बातें
थक गये है गिरा गिरा के घर,
आज करते मजार की बातें
लनतरानी न हाँकिये साहब
अब करेंगे दयार की बातें
बात जब हो रही पहाड़ों की
क्यूँ करो हो पठार की बातें
— हमीद कानपुरी
