उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 22)

अपनी कुटी के बाहर यज्ञ वेदी पर बैठे श्री राम की ओर देखते हुए भावविह्वल होकर भरत जी “भैया!” कहते हुए श्री राम की ओर दौड़े और उनके निकट पहुँचकर पृथ्वी पर गिर पड़े। शत्रुघ्न जी ने भी श्री राम के चरणों में प्रणाम किया। श्री राम ने दोनों भाइयों को उठाकर अपने वक्ष से लगा लिया। उनके दोनों नेत्रों से भी अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। फिर श्री राम और लक्ष्मण जी भरत जी के साथ आये हुए महामंत्री सुमन्त्र जी और निषादराज गुह से मिले। सभी आपस में मिलकर पुलकित हो रहे थे, जैसे बहुत वर्षों के बिछुड़े हुए स्वजन मिले हों। उनके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था, परन्तु आँखों से बहते हुए आँसू बहुत कुछ कह दे रहे थे।

श्री राम ने भरत जी को एक बार पुनः अपने हृदय से लगाया। फिर बड़े स्नेह से उन्हें अपने निकट बैठाकर पूछा- “भाई! तुम वल्कल वस्त्र पहनकर और जटा धारण करके वन में क्यों आये हो? मैं बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रहा हूँ। तुम इतने दुर्बल क्यों हो गये हो? सब कुछ कुशल तो है? पिताजी और माताओं को कहाँ छोड़ आये हो? मुझे साफ-साफ बताओ।”

यह सुनकर भरत जी की रुलाई फूट पड़ी। रोते-रोते बोले- ”भैया! पिताजी आपके वियोग में हम सबको छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये हैं।“ इतना कहकर वे फिर रोने लगे।

अपने पिता की मृत्यु का समाचार जानकर श्री राम, लक्ष्मण जी और सीता जी के शोक का पारावार नहीं रहा। वे सभी ”हाय पिताजी!“ कहकर विलाप करने लगे। कुछ देर विलाप करने के बाद वे कुछ शान्त हुए। फिर श्री राम भरत जी से पूछने लगे- ”भरत! तुम अयोध्या को छोड़कर यहाँ क्यों आये हो? मुझे अपना उद्देश्य स्पष्ट कहो। मैं सब तुम्हारे मुख से ही सुनना चाहता हूँ।“

यह सुनकर भरत जी ने हाथ जोड़कर कहा- “आर्य! पिताजी ने मेरी माता के कहने में आकर आपको वनवास देने का कठोर कर्म किया था। आप मुझे अपना दास जानकर मेरे ऊपर कृपा कीजिए और आज ही अपना अभिषेक कराकर राज्य ग्रहण कीजिए। सभी प्रजाजन और माताएँ भी मेरे साथ आपके पास आयी हैं। इन पर भी कृपा कीजिए।”

यह कहकर भरत जी ने अपने नेत्रों से आँसू बहाते हुए फिर श्री राम के चरणों में माथा टेक दिया। तब श्री राम ने पुनः उनको उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा- “भाई! तुम्हीं बताओ कि मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ? इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है और तुम्हें अज्ञानतावश माताओं की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए। महाराज को हमें सभी तरह की आज्ञा देने का अधिकार है।

माता और पिता दोनों ने धर्मपूर्वक मुझे वन में रहने और तुम्हें राज्य देने की आज्ञा दी है। इसलिए हमें उनकी आज्ञा माननी चाहिए। हमारे लिए यही उचित है कि तुम अयोध्या में रहकर राज्य का पालन करो और मैं दंडकारण्य में निवास करूँ।”

यह सुनकर भरत जी ने उत्तर दिया- “नरश्रेष्ठ! मैं राज्य का अधिकारी नहीं हूँ। हमारे कुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता आया है। इसलिए आप अयोध्या लौट चलिए और अपना अभिषेक कराइए। पिताजी अत्यन्त कठिन पुत्रशोक से पीड़ित होकर स्वर्गलोक को गये हैं। उनको जलांजलि दीजिए। कहते हैं कि प्रिय पुत्र का दिया हुआ जल आदि पितृलोक में अक्षय होता है और आप पिताजी के परम प्रिय पुत्र हैं।”

अपने पिताजी की मृत्यु पर श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी को फिर शोक हुआ और उनके लिए विलाप किया। फिर वे सभी भाई विलाप करते हुए मंदाकिनी नदी के तट पर गये। वहाँ श्री राम ने नदी के जल में खड़े होकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पिता को विधिवत जलांजलि दी और फिर किनारे पर लौटकर उनका पिण्डदान किया। फिर वे सभी रोते हुए धीरे-धीरे चलकर आश्रम में लौट आये।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 13, सं. 2082 वि. (23 अगस्त, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com