ग़ज़ल
जो झूठी आन बान से आगे निकल गया
वो हरेक इम्तिहान से आगे निकल गया
राह रोकने वाले दीवार बनते रह गए
इधर मैं पूरी शान से आगे निकल गया
उलझा यूं मेरी बात में सूरज कि एक दिन
अपने ही आसमान से आगे निकल गया
भेजा था तुझको खुदा ने इंसान बना कर
हरकत में तू शैतान से आगे निकल गया
गुफ्तगू तुझसे नहीं मुमकिन है अब कि तू
तहज़ीब की ज़ुबान से आगे निकल गया
— भरत मल्होत्रा
