अच्छे थे हम अक्ल के कच्चे
बचपन का वह दौर सजीला,
कभी रूठना कभी #मचलना,
खेल-खेल में गिर भी जाते,
गिर-गिरकर फिर स्वयं सँभलना ।
हँसते-हँसते रोने लगना,
लोरी सुनकर पलक झपकना,
अपनी माता का ममता-धन,
लगता है अब बीता सपना।
अपनी बात को मनवाना,
अच्छा लगता अकड़ दिखाना,
इच्छा पूरी नहीं हो जल्दी,
शुरु हो जाता मचल जाना।
मन के राजा थे हम बच्चे,
नटखट थे पर दिल के सच्चे,
जाने क्यों समझदार हो गए,
अच्छे थे हम अक्ल के कच्चे।
— लीला तिवानी
