सामाजिक

एक सच्चा दोस्त ना मिलने का दर्द

जीवन एक सफ़र है, जिसमें रास्ते बदलते हैं, मंज़िलें बदलती हैं, और लोग भी बदलते रहते हैं। इस सफ़र में हम हज़ारों लोगों से मिलते हैं कुछ साथ चलते हैं, कुछ अपनी राहें बदल लेते हैं। पर इन सबके बीच एक चीज़ जिसकी तलाश हर किसी को होती है, वो है : एक सच्चा दोस्त। सच्चा दोस्त वह होता है जो बिना शर्त के साथ दे, जो ख़ुशी में ख़ुश हो और दुख में चुपचाप कंधा दे। जो आपकी ग़लतियों पर आपको आईना दिखाए, पर आपको छोड़ कर न जाए। वह आपके पीछे नहीं, आपके साथ खड़ा होता हो हर हाल में। सच्चा दोस्त वह होता है, जिससे आप अपने दिल की बात बिना किसी डर या झिझक के कह सकें।
लेकिन आजकल हर किसी को ऐसा दोस्त नहीं मिलता। कुछ लोग पूरी ज़िंदगी तलाश करते रहते हैं और फिर भी अकेले रह जाते हैं। ये अकेलापन बाहर से नहीं, अंदर से तोड़ता है। जब आपकी बातें सुनने वाला न हो, जब आपके दुख बांटने वाला कोई न हो, तब इंसान सबसे ज्यादा टूटा हुआ महसूस करता है और अंदर से खोखला महसूस करता है बिना किसी आधार का। आपके पास लोग हो सकते हैं साथ बैठने वाले, हँसी मज़ाक करने वाले, पर जब वक़्त मुश्किल आए और कोई न खड़ा मिले, तब एहसास होता है कि भीड़ में भी कितना अकेलापन हो सकता है।
अक्सर ऐसा होता है कि हम किसी को सच्चा दोस्त समझ बैठते हैं, लेकिन वक़्त के साथ वो बदल जाते हैं। उनका स्वार्थ सामने आ जाता है, और हमें यह समझने में देर नहीं लगती कि हम जिन पर सबसे ज़्यादा भरोसा करते थे, वो ही हमें सबसे ज़्यादा दर्द दे गए। यह दर्द बहुत गहरा होता है क्योंकि यह उस रिश्ते का टूटना होता है, जिसमें हमने दिल से यक़ीन किया था।
एक सच्चा दोस्त न मिलने का दर्द बहुत कुछ सिखा जाता है। यह सिखाता है कि आत्मनिर्भर बनना ज़रूरी है। यह समझाता है कि हर किसी से उम्मीद करना सही नहीं। और सबसे बड़ी बात की हमें खुद के साथ दोस्ती करना सिखा देता है। जब हम खुद के सच्चे दोस्त बन जाते हैं, तब बाहर की कमी थोड़ी कम लगने लगती है।
सच्चा दोस्त मिलना भाग्य की बात है। पर अगर वो न मिले, तो भी ज़िंदगी खत्म नहीं होती। हाँ, कुछ खालीपन ज़रूर रह जाता है, पर उस खालीपन को भरने के लिए खुद से प्यार करना, खुद को समझना और दूसरों की सच्चाई पहचानना सीखना ज़रूरी है।
जो खुद के साथ सच्चा है, वही दुनिया से भी सच्चा रिश्ता निभा सकता है। कुछ यादें –

कहाँ छिपा है वो चेहरा, जो दिल को समझ पाए,
बिना कहे ही मेरे इन आँखों में छिपे आँसू पढ़ जाए।

हर मोड़ पर तो लोग मिले, हँसे, साथ चले कुछ दूर,
पर दिल के वीराने में अब तक है वही सूनापन भरपूर।

हर कोई मतलब से जुड़ा, हर रिश्ता शर्तों में बँधा,
कभी किसी ने बस इसलिए साथ दिया कि फायदा था।

ना कोई ऐसा मिला, जो बिना चाहत के अपना लगे,
जो टूटे हुए मेरे दिल ज़ज्बात को अपने कंधे पर टिकने दे।

कभी मैंने चाँदनी रातों को जागा, तो चाँद से बात की,
कभी अपने दिल की चुप्पी को, खुद ही अपने साथ की।

कितना आसान लगता है किसी का कहना “मैं हूँ न साथ तेरे,”
पर जब वक़्त बुरा आया मेरा, तो सबने मोड़ लिए चेहरे अपने।

कभी मैं सोचा करता था “काश कोई होता मेरा भी यार,”
जिससे बाँट सकूँ सबकुछ अपनी हँसी, अपना दर्द, हर जख्म।

पर मैंने अब सीख लिया है जीना इस खालीपन के साथ,
कभी अब उम्मीद ना करना, बस चलना अपनी ही इस बात।

— रूपेश कुमार

रूपेश कुमार

भौतिक विज्ञान छात्र एव युवा साहित्यकार जन्म - 10/05/1991 शिक्षा - स्नाकोतर भौतिकी , इसाई धर्म(डीपलोमा) , ए.डी.सी.ए (कम्युटर),बी.एड(फिजिकल साइंस) वर्तमान-प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी ! प्रकाशित पुस्तक ~ *"मेरी कलम रो रही है", "कैसें बताऊँ तुझे", "मेरा भी आसमान नीला होगा", "मैं सड़क का खिलाड़ी हूँ" *(एकल संग्रह) एव अनेकों साझा संग्रह, एक अंग्रेजी मे ! विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओ मे सैकड़ो से अधिक कविता,कहानी,गजल प्रकाशित ! राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थानों से सैकड़ो से अधिक सम्मान प्राप्त ! सदस्य ~ भारतीय ज्ञानपीठ (आजीवन सदस्य) पता ~ ग्राम ~ चैनपुर  पोस्ट -चैनपुर, जिला - सीवान  पिन - 841203 (बिहार) What apps ~ 9934963293 E-mail - - rupeshkumar01991@gmail.com