कविता

कहीं आप भी तो नहीं

कहीं उन चंद गुलामों में आप भी तो नहीं,
जिसे कहा जाता है सामाजिक दलाल,
काम है जिसका करना
सामाजिक लोगों को हलाल,
अब वो समय नहीं रहा कि
दबे छुपे रूप में आप
विरोधियों के खेवनहार बनते हो,
सच्चा हितैषी का चोला पहनने हो,
चांदी के चंद सिक्कों की
चमक में खो जाते हो,
खुद के भले के लिए
किसी के भी बिस्तर में सो जाते हो,
आज वक्त ऐसा है कि छुप नहीं सकते,
सच्चा सामाजिक व्यक्ति
किसी के भी आगे झुक नहीं सकते,
दलाल समाज को धोखा तो देता ही है
वह महापुरुषों को भी ठेंगा दिखाता है,
बदले में बदलाव,प्रगति की रफ़्तार
दुश्मनों के हिसाब से धीमा कर जाता है,
जो चले शत्रुओं के बताए चाल पर,
बुरा नहीं होगा यदि
मार दो तमाचा ऐसों के गाल पर,
कोई धनवान है,कोई पदवान है,
सबको पता है कौन किसका हनुमान है,
जागृति की धार इतनी तेज करो कि
हर जोर जुल्म बंधन कटता जाए,
गद्दार वही होगा जो
सामाजिकता की राह से हटता जाए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554