बाल कविता

मेरी साइकिल

पापा ने साइकिल दिलवाई, चलने की मुझे रीत सिखाई,
जन-चेतना जगाऊंगा अब, इसमें ही है सबकी भलाई।
रंग बिरंगी साइकिल मेरी, मित्रों को भी भाती है,
कहते इसकी टन-टन घंटी, बीन बजाती आती है!
परिवहन-साधन के रूप में, साइकिल को अपनाओ प्यारे,
सस्ती-सुलभ-सरल है साइकिल, भूल न जाना इसको प्यारे।
साइकिल चलाओ, सेहत सुधारो, पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ,
ईंधन का उपयोग नहीं है, प्रदूषण मुक्त है सबको बताओ।
स्वच्छ इंडिया, क्लीन इंडिया, साइकिल से संभव होगा,
वायु भी जब शुद्ध रहेगी, भला हमारा भी तब होगा।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244