कविता

कल का सिद्धांत

कल, कल आयेगा
और वो कल कभी नहीं आयेगा,
ये कल की मृगतृष्णा ही हमारी आपकी समस्या है।
क्योंकि हम आज और अभी की उपेक्षा करते हैं
और कल की चिंता में अपना ही खून चूसते हैं,
उस कल की जो आयेगा ही नहीं।
सदियां गुजर गईं,
बड़े-बड़े ज्ञानी, संत-महात्मा, विद्वान, वैज्ञानिक
भविष्यवक्ता, डाक्टर, नेता, अभिनेता, विचारक, प्रचारक, चिंतक, राजा-महाराजा, अमीर-गरीब
ऊँच- नीच और असंख्य प्राणी आये और गये
आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा,
क्योंकि आज, हमेशा कल में ही ढकेला जायेगा,
कल, आज के सामने कभी नहीं आयेगा।
अपनी तरह सिर्फ हमें उलझायेगा,
हमारा ध्यान अपनी ओर खींचेगा, आज से मुँह चुरायेगा।
क्योंकि कल, कल है, आज नहीं,
आज, आज है कल नहीं,
और कल, कल ही आयेगा, आज नहीं।
पर विडंबना देखिए
हम सब जानते हैं कि ऐसा ही है
फिर भी मानते नहीं है,
आज और अभी के बजाय कल का भरोसा करते हैं,
उस कल का, जो कभी न आया था, न आयेगा
पर हमारे वर्तमान की नींव जरुर हिलाता रहेगा,
अपनी अहमियत का लोहा मनवाया रहेगा
हमें ही नहीं आपको भरमाता रहेगा,
कल हमेशा हमसे दूर जाता रहेगा
और हमारी मूर्खता पर हमें ही चिढ़ाता रहेगा
पर अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा
मृगतृष्णा की तरह हमें भरमाता रहेगा।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921