ग़ज़ल
इसमें इतना अचरज क्या है
छल को सत्य सदा अखरा है
उनकी छटपट से लगता है
तीर निशाने पर बैठा है
ऐंठ रहे थे जिसके दम पर
वो रुतबा तो चोरी का है
सीना-जोरी हेरा-फेरी
छल की और सियासत क्या है
ड़रता है जो सच कहने से
ज़िन्दा होकर भी मुर्दा हैं
उनको रिश्तों से क्या मतलब
जिनकी फ़ितरत ही धोखा है
चारण बन कर माल कमाओ
कवि होने में क्या रक्खा है
— सतीश बंसल
