कविता

सुर में सुर मिलाना

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को
जब भी होता है गाना,
नहीं भटकना अपने लय से
सुर में सुर मिलाना,
पर अलग होता है हर सुर,
पक्षियों का करलव सुर,
कुत्तों के रोने का सुर,
शेरों के दहाड़ का सुर,
हाथियों के चिंघाड़ का सुर,
मुर्गों के बांगों का सुर,
गधों के चिल्लाने का सुर,
हां बता देता है हर सुर कि
है कौन सी आवाज किसकी,
आ जाता है पूर्ण समझ
आवाज निकल जाए जिसकी,
पर हर सुर कुछ कहता है,
लेकिन हम इंसानों को
सोच समझ कर गाना है,
नकल यदि करने लगे,
तुरंत मिलता ताना है,
औरों की राग अलापेंगे तो,
खुद का सुर मिटा जाएंगे,
परंपरा का नाम दे देकर
अपनी पहचान मिटायेंगे,
तोते सा रटना छोड़ो,
अपना वजूद दिखाओ और
सच्चाई से ना मुंह मोड़ो।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554