ज़िंदगी और ख़यालात का सफ़र
ज़िंदगी एक आईना है, और उसका नक़्शा हमारे ख़यालात बनाते हैं। इंसान जैसा सोचता है, वैसे ही मंज़र उसके सामने उभर आते हैं। अगर दिल में उम्मीद के चराग़ जल उठें तो अंधेरी रातें भी रोशन हो जाती हैं, और अगर सोच में रोशनी है तो अंधेरे भी रोशन बनने लगते है। लेकिन जब ज़हन नकारात्मक ग़ुबार से भर जाए तो आसमान के सितारे भी धुंधले पड़ जाते हैं और रोशनी भी बोझ मालूम होने लगती है।ख़यालात की हैसियत बीज जैसी है। मोहब्बत, और शुक्रगुजारी के बीज अगर दिल की ज़मीन में बो दिए जाएँ तो ज़िंदगी रंग-ब-रंग फूलों से महक उठती है। वहीं शक्क, कीना और बदगुमानी के बीज कांटों का जंगल उगा देते हैं, जो इंसान के हर क़दम को दर्द और अज़ीयत से भर देते हैं। यही वजह है कि कहा जाता है— इंसान की तक़दीर उसके ख़यालात के हवाले होती है।रोशन-ख़याल शख़्स तारीकी में चराग़ ढूंढ लेता है, जबकि तंग-नज़र इंसान उजाले में भी अंधेरे तलाश करता है। सक़ल्प की रोशनी ही इंसान का असली सहारा है। अगर सोच बुलंद और पाक हो तो नफ़रतें भी मिट सकती हैं और ज़िंदगी एक गुलिस्तान का रूप ले सकती है।
हर इंसान, को अपने ज़हन को तंगदिली से निकालकर उम्मीद और मोहब्बत के आसमान पर उड़ने देने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों के लिए आसानी पैदा करते रहना चाहिए। और मुश्किलात को सब्र और हिम्मत से गले लगाना चाहिए देख, यही ख़याल ज़िंदगी को जन्नत बना देंगे और यही तुझे कामयाबी की बुलंद चोटियों तक पहुँचा देंगे।
— डॉक्टर मुश्ताक अहमद शाह
