कविता

नासमझ ही रह गए

कभी कभी तैरने की चाह
हमें कहीं का नहीं छोड़ता,
हमारे सोचने से पहले ही
वो हमारी हौसला है तोड़ता,
समुद्र में तैरने की
हजारों साल की इच्छा
पूरी होने लगी एक झटके में,
तब तक डूबे भी नहीं थे
पानी से भरे एक मटके में,
शुभचिंतक ने सलाह दी
पहले तैरने के दांव पेंच सीख जाओ,
नहाने की कोई और व्यवस्था हो जाये
तो सीधे समुद्र में मत नहाओ,
पानी हमें डूबा सकता है,
हमारा अस्तित्व मिटा सकता है,
मगर हम समुद्र के प्यासे,
छोड़ काम धाम अच्छे खासे,
पर बिना सोचे समझे
हमने लगा दिया छलांग,
ध्यान नहीं दे पाए दूरी
कुछ मीटर थी या फर्लांग,
हालांकि शुभचिंतक ने सुझाया था,
डूबने से बचने के लिए
बहुत बड़ा सुरक्षित पुल बताया था,
अपनी नासमझी के कारण
आज प्रतिदिन डूब रहे हैं,
एक नई समस्या से जूझ रहे हैं,
पड़ रही मार और जात की गालियां,
कोई भी ठोंक रहा बजा बजा तालियां,
महापुरुषों ने हमें बचाने
क्या कुछ नहीं कह गए,
नासमझ ही थे और
आज भी नासमझ ही रह गए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554