लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 26)
ऋषि जाबालि से बात करते हुए श्री राम कुछ रोष में आ गये थे, इसलिए महर्षि वशिष्ठ ने उनको शान्त करने के लिए कहा- “रघुनन्दन! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि प्राणियों का इस लोक से परलोक में जाना और पुनः इसी लोक में लौटना होता रहता है, इसलिए वे नास्तिक नहीं हैं। वे जगत में आवागमन के नियम को जानते हैं। उन्होंने तुम्हें अयोध्या लौटाने की इच्छा से ही कुछ नास्तिकतापूर्ण बात कही थी। इसलिए तुम उन पर रोष मत करो।”
इसके बाद वशिष्ठ जी ने श्री राम को उनके वंश का पूरा इतिहास सुनाते हुए कहा- ”राम! प्रथम प्रजापति मनु के वंश में तुम्हारे आदिपूर्वज इक्ष्वाकु चक्रवर्ती सम्राट हुए थे। उनके ही वंशज सम्राट रघु हुए, जिनके नाम पर तुम राघव और रघुवंशी कहे जाते हो। उनके ही वंशज तुम्हारे पिता राजा दशरथ हुए। तुम्हारे इस महान वंश में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता आया है। यह परम्परा अभी तक कभी टूटी नहीं है। तुम भी इसी परम्परा का पालन करो।
तुम महाराज दशरथे के सबसे बड़े पुत्र हो, इसलिए तुम्हें ही राजा होना चाहिए। ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए कभी भी कनिष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक नहीं हो सकता। अयोध्या का यह राज्य तुम्हारा है, इसलिए तुम ही इसे ग्रहण करो और इसका पालन-पोषण करते रहो। यशस्वी राम! यह तुम्हारा सनातन कुलधर्म है। तुम इसको नष्ट मत करो।“
अपने पूज्य गुरु की बात सुनकर श्री राम असमंजस में पड़ गये और विचारमग्न हो गये। यह देखकर वशिष्ठ जी ने आगे कहा- “राम! इस संसार में पुरुष के सदा तीन गुरु होते हैं- आचार्य, पिता और माता। मैं तुम्हारा और तुम्हारे पिता का भी आचार्य हूँ, इसलिए गुरु हूँ। मेरी बात का पालन करने से तुम्हारे द्वारा कोई अधर्म नहीं होगा। तुम्हारी वृद्धा माता भी यही चाहती हैं। उनका आदेश तो कभी टालना ही नहीं चाहिए। उनका आदेश पालन करने से तुम्हें कभी अधर्माचरण का पाप नहीं लगेगा। तुम्हारे भाई भरत भी तुमसे अयोध्या लौट चलने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना कर रहे हैं। उनकी बात मान लेने से तुम्हारे किसी धर्म का उल्लंघन नहीं होगा। इसके अलावा यहाँ सभी सभासद्, बन्धु-वान्धव और सामन्त भी पधारे हुए हैं। उनके सामने तुम्हें धर्माचरण ही करना चाहिए।“
गुरु वशिष्ठ जी की यह बात सुनकर श्री राम ने दृढ़ता से उत्तर दिया- “गुरुवर! पिताजी ने मेरे लिए जो कुछ किया था, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता। उन्होंने मुझे जो आज्ञा दी है वह किसी भी तरह मिथ्या नहीं हो सकती। वर्तमान में मेरे समक्ष तो वही सबसे बड़ा धर्म है। इसके सामने मैं किसी अन्य धर्म को नहीं देखता।”
श्री राम का यह दो टूक उत्तर सुनकर सभी लोग बहुत उदास हो गये। अभी तक भरत जी गुरु और शिष्य का वार्तालाप मौन होकर सुन रहे थे। श्री राम का अन्तिम उत्तर सुनकर वे चुप न रह सके और अपने निकट बैठे महामंत्री सुमन्त्र जी से बोले- “सारथी! तुम यहाँ वेदी पर ही मेरे लिए कुश बिछा दो। जब तक आर्य मेरे ऊपर प्रसन्न नहीं होंगे, तब तक मैं यहीं पर धरना दूँगा। जैसे किसी साहूकार द्वारा धन छीनने पर कोई ब्राह्मण उसके घर के दरवाज़े पर मुँह ढककर बिना कुछ खाये-पिये पड़ा रहता है, उसी तरह मैं भी यहाँ तब तक लेटा रहूँगा, जब तक ये मेरी बात मानकर अयोध्या नहीं लौटेंगे।”
यह आदेश सुनकर सुमन्त्र जी असमंजस में पड़ गये कि इसका पालन करें या न करें। वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर श्री राम की ओर ताकने लगे। यह देखकर भरत जी समझ गये कि सुमन्त्र जी असमंजस में पड़ गये हैं। तब वे स्वयं वहाँ कुश की चटाई बिछाकर भूमि पर बैठ गये। यह देखकर महातेजस्वी श्री राम ने कहा- “तात भरत! मैंने तुम्हारे साथ क्या बुराई की है कि तुम मेरे सामने धरना दोगे? कोई ब्राह्मण एक करवट लेटकर मनुष्यों को अन्याय करने से रोक सकता है, परन्तु राजतिलक ग्रहण करनेवाले क्षत्रियों के लिए इस प्रकार धरना देने का विधान नहीं है। इसलिए इसका कोई औचित्य नहीं है। अतः तात! तुम अपना हठ छोड़कर उठो और अयोध्या पुरी को लौट जाओ।”
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 8, सं. 2082 वि. (31 अगस्त, 2025)
