गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

शराबी से ख़फ़ा होकर ये बेचारी नहीं जाती,
यहां बीवी की शौहर से वफ़ादारी नहीं जाती।

बहुत ननुक़सान करती हैं हमारी फ़स्ल का लेकिन,
हमारे गाओं में चिड़िया कोई मारी नहीं जाती।

ग़रीबी में भी दो रोटी उसे बेशक खिलाते हैं,
कि भूकी गाऐ दादा जी से धुतकारी नहीं जाती।

ज़मीनों के अभी काग़ज़ नहीं फैंके बुज़ुरगों ने,
ज़मीनें खो गईं लेकिन ज़मींदारी नहीं जाती।

दवाओं से फ़क़त मिटती नहीं संगीन होने पर,
बिना तीमारदारों के ये बीमारी नहीं जाती।

वो कोई ग़लती कर दे पर उसी की ओर लेती है,
यहां दादी के पोते से तरफदारी नहीं जाती।

यहां रिश्तों को दौलत के तराज़ू में नहीं रखते,
सुदामा और कृश्ना की यहां यारी नहीं जाती।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।