ग़ज़ल
खायी ठोकर लड़खड़ाई लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
इस डगर से डगर जा लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
तोड़ डाला व्याकरण को नहीं माने नियम सारे,
डगमगाते कदमों से ही लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
गुफ्तगू महबूब से कर हो गई पर्दा नशीं जब,
इश्क की गलियां भटकते लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
सच को सच कहना ही होगा अब समय कहता है ये,
छोड़कर झूठी तिलिस्में लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
लिख सको तो लिखना तुम अपने समय की दास्तां,
दुःख भरा इतिहास लेकर लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
लिख दिया एहसास जिसने डूबकर नदियां समंदर,
प्रेम की संकरी गली चल लक्ष्य तक पहुंची ग़ज़ल।
— वाई. वेद प्रकाश
