लघुकथा – खिचड़ी
“माँ जी ! आज त्यौहार है। घर में पकवान बने हैं। आप क्या खायेंगी- पूड़ी, कचौड़ी, पुलाव, खीर या कुछ और?”
“बहू ! मेरे तो दाँत ही नहीं हैं। मैं इनको नहीं खा सकती। मेरे लिए तो तुम ज़रा सी खिचड़ी बना दो।”
त्यौहार के दिन खिचड़ी बनाने की बात सुनकर बहू एक बार तो सन्न ही रह गयी। फिर सोचने लगी कि त्यौहार के दिन सासु माँ को भूखा भी तो नहीं रखा जा सकता। इसलिए उसने जल्दी से दाल-चावल निकालकर भिगो दिये और सबके भोजन करने से पहले ही खिचड़ी बनाकर सासु माँ को दे दी।
खिचड़ी खाते हुए सासु माँ का हृदय उसको आशीर्वाद बरसा रहा था।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
