शिक्षक महान
नहीं जीवन है रुक-रुक कर जीना
मँजिल जब हो अंधेरों में गुमशुदा
तमस हृदय में ज्ञान दीप जगाए
सत्य पथ दिखाए गुरु महान !
ए शिक्षक महान प्रणाम तुम्हें !
कस्तूरी मृग सा हो जब बेखबर
विचरता मन बस इधर-उधर
भीतर बसती महक रूहानी से
रूबरू करवाए गुरु देव !
ए गुरु महान प्रणाम तुम्हें !
माटी काया को स्वर्णिम बनाए
आशीष तेरे से गतिशीलता सम्भव
जीवन लफ्ज़ का भेद सुलझाए
भव-सागर पार कराए गुरु महान !
ए गुरुदेव महान सलाम तुम्हें !
बेजान बदन पर पंख लगाए
भरोसा नभ पर उड़ने का
अधूरे जीवन में सार्थकता का
दिव्य बोध करवाए गुरु महान !
ए शिक्षा दाता प्रणाम तुम्हें !
— मुनीष भाटिया
