समाज का उत्थान हो सर्वोपरि.
किसी भी देष में संवैधानिक रूप से रहने वाला वो प्रत्येक सदस्य जिसके मन-मस्तिष्क में अपने देष के प्रति समर्पण की भावना, सच्ची श्रद्धा एवं उसके प्रति जवाबदारी होती है, वही उस देष का नागरिक कहलाता है।
अब हम बात करते हैं उसी देष में कोई भी समाज बनता कैसे है? व्यक्ति, परिवार, समुदाय, सामाजिक रीति-रिवाज एवं परम्पराओं को मानने वाले लोगों का एक ऐसा समूह जो परस्पर एक साथ रहता है। जो वाणी एवं व्यवहार से अपनी भावनाओं तथा हितों को एक-दूसरे के साथ बातचीत करके साझा करते हैं, उसे समाज कहते हैं। एक सुन्दर, स्वस्थ समाज का निर्माण व्यक्तियों के परस्पर जुड़ने, आपसी सहयोग करने एवं एक-दूसरे पर निर्भर रहने से होता है। देखा जाए तो समान आचार-विचार, व्यवहार, मान्यताओं, रीति-रिवाजों को मानने वाले लोग ही मिलकर समाज का निर्माण करते हैं। परिवार के बाद किसी भी व्यक्ति के भविष्य निर्माण में समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। देखा गया है कि एक ही जाति, धर्म को मानने वाले स्वधर्मी व्यक्तियों के समूह को भी समाज कहा जाता है। वैसे तो सर्वप्रथम हम सभी भारतवासी है लेकिन जिस किसी भी समाज से हम आते हैं तो हमारी पहली जिम्मेदारी तो अपने देष के प्रति एवं दूसरी अपने समाज के प्रति होनी चाहिए। हमारे देष में अनेकों समाज एवं उनमें भी अनेकों जातियाँ होती है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति की यह भावना होती है कि मैं जिस किसी भी समाज से आता हूँ तो मेरे साथ-साथ मेरे समाज का भी उत्थान हो। यदि मैं आगे बढूँ तो मेरा समाज भी मेरे साथ-साथ आगे बढ़े। इसके लिए वह भरसक प्रयास भी करता है। मेरा ऐसा मानना है कि चाहे कोई सा भी समाज हो, उसमें योग्य एवं कुषल व्यक्तियों की कहीं कोई कमी नहीं होती। एक से बढ़कर एक कर्मठ, योग्य एवं ज्ञानी पुरुष/महिलाएँ उसमें भरी होती है। कुषल डॉक्टर, इंजीनियर, षिक्षाविद्, चार्टड एकाउण्टेंट, वकील, उद्योगपति, व्यवसायी, प्रेरक वक्ताओं एवं राजनेताओं की जिसमें कोई कमी नहीं है।
किसी भी कार्य को सुन्दर रूप से क्रियान्वित करने में अक्सर हमें विषेषज्ञों के सलाह की आवष्यकता पड़ती ही है। समय की मांग को देखते हुए आज जरूरत है कि हमें ऐसे लोगों पर ध्यान देने के साथ-साथ उन्हें समाज के प्रत्येक कार्य में आगे लाने की है। हमें उनके ज्ञान एवं मार्गदर्षन की आज सर्वाधिक आवष्यकता है। समाज में हमें इन सभी विषेषज्ञों के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना होगा ताकि इनके तजुर्बे, ज्ञान एवं परामर्ष से हमें इनकी सेवाएँ निरन्तर मिलती रहें। ऐसा करने से ही हम एक सुन्दर एवं सुदृढ़ समाज का निर्माण कर सकते हैं। ज्ञानीजन हमेषा कहते हैं कि बंटा हुआ समाज अपनी ही उन्नति में बाधक होता है। एक सुन्दर एवं सुदृढ़ समाज होने से ही एक विकसीत देष की कल्पना की जा सकती है। समाज अच्छा होगा तो किसी भी विकासषील देष को विकसित देष में बनने में देरी नहीं लगती।
और हाँ, यहाँ एक बात रोजगार के सम्बन्ध में भी कहना चाहूँगा कि प्रायः देखा गया कि कुछ अन्य समाजों में अपने ही समाज के योग्य एवं कुशल लोगों को अपने यहाँ पर रोजगार देने को प्राथमिकता दी जाती है। मैं उन सभी लोगों से जो एक कुशल व्यापारी, उद्योगपति अथवा किसी भी क्षेत्र में ज्यादा-से-ज्यादा रोजगार प्रदान करने वाला कार्य करते हो। उन्हें यह बताना चाहता हूँ कि आपके अपने ही समाज के बच्चों में भी योग्यता की कोई कमी नहीं है। पहले अपने समाज के बच्चों में योग्यता को ढूँढें और उन्हें अधिक-से-अधिक रोजगार प्रदान करने का प्रयास करें। मैं यहाँ यह कतई नहीं कहता कि अपने समाज के लोगों को रोजगार देते समय उनकी योग्यता एवं कुशलता को न देखा जाये। एक प्रसिद्ध मारवाड़ी कहावत मुझें यहाँ याद आती है कि- ‘‘घर रा पूत तो कुँवारा फिरे, ने दूजा ने परनावन जाए।’’
अपने-अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मेरा मात्र इतना ही निवेदन है कि आपकी इस छोटी सी पहल से न केवल समाज का उत्थान होगा और उन सभी बच्चों को रोजगार भी मिल जाएगा जिसकी उन्हें आज वास्तव में आवश्यकता है। चिन्तन करके इसके लिए पहल आपको करनी है। यह मेरा एक निजी चिन्तन है, इस चिन्तन से यदि किसी को ठेस पहुँची हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ।
— राजीव नेपालिया (माथुर)
