लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 29)
प्रातः उठकर सभी अपने नित्य कर्म करके चलने को तैयार हुए। पहले उन्होंने यमुना नदी पार की, जिसमें बहुत समय लग गया। फिर वे संगम की ओर जाने के स्थान पर सीधे शृंगवेरपुर की ओर चल दिये। शीघ्र ही उन्होंने शृंगवेरपुर के निकट पहुँचकर गंगा जी के दर्शन किये। वहाँ निषादराज गुह के मल्लाहों की नावों से उन्होंने पहले की तरह गंगा नदी पार की और शृंगवेरपुर पहुँचे।
निषादराज ने उनसे एक रात्रि वहीं विश्राम करने का अनुरोध किया, परन्तु भरत जी ने इसे विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। वे शीघ्र से शीघ्र अयोध्या पहुँचकर वहाँ की व्यवस्था देख लेना चाहते थे। इसलिए सभी ने वेग से चलकर अयोध्यापुरी के दर्शन किये।
भरत जी ने शीघ्र ही अयोध्या में प्रवेश किया। उस समय अयोध्या नगरी बहुत विपन्न स्थिति में थी। उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचरण कर रहे थे। घरों के किवाड़ बन्द थे। कहीं प्रकाश न होने के कारण सब ओर अन्धकार छाया हुआ था, जैसे कृष्ण पक्ष की काली रात हो। उस समय अयोध्या नगरी ऐसी पर्वतीय नदी की भाँति दिखाई देती थी, जिसका जल सूर्य की किरणों से गर्म होकर मिट्टी से गँदला भी हो रहा हो, जिसके पक्षी धूप से सतप्त होकर भाग गये हों और जिसकी मछलियाँ और मगरमच्छ गहरे जल में छिप गये हों। अयोध्या किसी युद्ध में पराजित नगरी जैसी दिखाई दे रही थी, जिसके मुख्य योद्धा मार डाले गये हों।
अयोध्या की हाट की दुकानें बहुत कम खुली थीं। सारी शोभा नष्ट हो गयी थी, जैसे तारे और चन्द्रमा बादलों के आ जाने से ढक गये हों। नगरी उस उजड़ी हुई मधुशाला के समान दिखायी दे रही थी, जिसकी सफाई न की गयी हो। यत्र-तत्र कूड़े करकट के ढेर लगे हुए थे। सर्वत्र अव्यवस्था और विनाश जैसे दृश्य ही दिखाई दे रहे थे। यह सब देखकर भरत जी को बहुत दुःख हुआ।
अयोध्या की दुर्दशा देखकर भरत जी ने अपने सारथी सुमन्त्र जी से कहा- “अब अयोध्या में पहले की तरह गीत-संगीत के स्वर सुनाई नहीं दे रहे। सब ओर से उठने वाली फूलों और यज्ञ की सुगन्ध भी नहीं फैल रही है। घोड़ों की हींसने, हाथियों के चिंघाड़ने, रथों की घरघराहट आदि के शब्द भी सुनाई नहीं दे रहे। इस पुरी के लोग अब बाहर घूमने भी नहीं निकलते। श्री राम के निर्वासित होने के कारण ही नगर की यह दुर्दशा हुई है। अयोध्यापुरी की सारी शोभा भैया के साथ ही चली गयी लगती है।”
इस प्रकार बहुत सी बातें करते हुए भरत जी ने अपने स्वर्गीय पिता महाराज दशरथ के भवन में प्रवेश किया। उस समय महाराज का भवन भी शोक के कारण शोभाहीन हो रहा था। उन्होंने सभी माताओं को उनके भवनों में पहुँचाया। फिर उन्होंने अपने पुरोहितों और मंत्रियों से कहा- “अब मैं नन्दीग्राम को जाऊँगा। इसके लिए आप सबकी आज्ञा चाहता हूँ।”
महात्मा भरत के ये शुभ वचन सुनकर सभी मंत्री और पुरोहित वशिष्ठ जी बोले- “भरत! तुम्हारी यह बात बहुत अच्छी और प्रशंसनीय है। यह तुम्हारे ही योग्य है।” मंत्रियों का अनुमोदन पाकर भरत जी ने सभी माताओं को अपने नन्दीग्राम जाने की सूचना दी और उनसे बातचीत करके जाने की आज्ञा ली। फिर वे श्री राम की चरणपादुका लेकर शत्रुघ्न जी के साथ रथ पर सवार हुए। सभी मंत्री और पुरोहित भी उनके साथ ही चल पड़े। उनकी सेना भी बिना बुलाये उनके पीछे चल पड़ी।
नन्दीग्राम पहुँचकर भरत जी रथ से उतरे और गुरुजनों से बोले- “मेरे भाई श्री राम ने यह राज्य मुझे धरोहर के रूप में दिया है। उनकी ये चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेम का निर्वाह करेंगी। इनके ऊपर क्षत्र लगाया जाये। मैं इनको साक्षात् श्री राम के चरण मानता हूँ।” इस प्रकार कहकर यशस्वी भरत अपने मंत्रियों के साथ नन्दीग्राम में रहकर राज्य का शासन करने लगे। वे सदा चरणपादुकाओं के अधीन रहकर राज्य के सभी कार्य कराने लगे।
नन्दीग्राम अयोध्या नगरी से बाहरी भाग में जंगल के किनारे ही एक छोटा सा ग्राम था। भरत जी ने वहीं पर्णकुटी बनाकर रहने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी और चरणपादुकाओं की सुरक्षा का भी पर्याप्त प्रबंध कर दिया। वे मुनिवेष धारण किये हुए ही फल-मूल का आहार करते हुए वहीं रहकर मंत्रियों को निर्देश दिया करते थे और बहुत कुशलता से राज्य का संचालन करते थे। उनके शासन में प्रजा बहुत सुखी और संतुष्ट थी।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 14, सं. 2082 वि. (6 सितम्बर, 2025)
