पितृ पक्ष
यूँ तो दाना रोज़ बिखराती,
पंछी आकर चुग ही जाती।
गउवें भी देहरी पर आतीं,
निज हाथों से मैं उन्हें खिलाती।
धर्म कहता है,इन पंद्रह दिनों में,
पूर्वज द्वारे पर आते हैं।
आदर, सत्कार पाकर फिर,
आशीष देकर चले जाते हैं।
कर में कुश और तिल लेकर,
मुख दक्षिण की ओर कर,
उल्टे हाथों से जल बहाओ।
जब तिथि अपनों की आए,
दोने में पकवान सजाओ,
काग और श्वान को जा खिलाओ।
माना है ये धर्मकर्म की बातें,
पर कुचले कैसे मन की जज़्बाते?
क्या काग-श्वान ही तुम्हारे रूप?
तुम तो हो इस गृह के भूप।
माना, चले गए दूर कहीं,
पर रहते हो मन में यहीं।
काग-श्वान को पूर्वज मानूँ?
यह मुझसे न होगा नाथ
क्षमा कर देना नाथ।
चाहे जिस लोक में तुम जाओ,
आशीष सदा हमें ही पाओ।
— सविता सिंह मीरा
