लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 31)
ऋषि भरद्वाज ने श्री राम से आगे कहा- ”यशस्वी राम! जब आप जटा और वल्कल वस्त्र धारण करके अपनी पत्नी और छोटे भाई के साथ वन को गये थे, तब मेरे मन में बहुत करुणा हुई थी। पूरे चौदह वर्ष बाद आपके लौटने पर आप तीनों को सकुशल देखकर मुझे बहुत हर्ष हो रहा है। मुझे पता है कि वन में विशेष रूप से जनस्थान में रहकर आपने बहुत दुःख उठाये हैं। सीता के हरण और उसके बाद सुग्रीव के साथ आपकी मैत्री, आपके हाथ से बाली का मारा जाना, हनुमान द्वारा लंका जाकर सीता जी की खोज और लंका दहन, आपकी प्रेरणा से नल-नील द्वारा समुद्र पर सेतु का निर्माण, फिर आपके द्वारा बन्धु-बांधवों सहित रावण के विनाश के समाचार भी मुझे प्राप्त हो चुके है।
मेरे शिष्य अयोध्या जाते रहते हैं, उनके द्वारा मुझे अयोध्या के सभी समाचार मिल जाते हैं। वहाँ भरत जी सहित सभी आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।“ श्री राम ने इस पर ऋषि का आभार व्यक्त किया। फिर वे विश्राम करने चले गये।
अपने विश्राम कक्ष में उन्होंने हनुमान जी को अपने पास बुलाकर कहा- ”तात! तुम अभी अयोध्या चले जाओ और भाई भरत को मेरे आने की सूचना दे दो। कहीं ऐसा न हो कि मेरे आने का समाचार न मिलने पर भरत कोई अनुचित पग उठा लें। अयोध्या के मार्ग में तुम शृंगवेरपुर में मेरे मित्र निषादराज गुह से अवश्य मिलना और उनको मेरी कुशलता और आने की सूचना देना। वे तुम्हें अयोध्या का मार्ग बतायेंगे और भरत के भी समाचार देंगे।
भरत के पास जाकर तुम उनको मेरे सकुशल होने और सीता तथा लक्ष्मण सहित लौटने का समाचार देना और मेरी ओर से उनकी कुशल पूछना। तुम उनको बलवान राक्षसराज रावण द्वारा सीताजी के हरण, बाली के वध, सीता जी की खोज, समुद्र पर सेतु बनाना और रावण के वध का समाचार भी सुनाना। फिर उनको बताना कि श्री राम शत्रुओं को जीतकर राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अन्य मित्रों के साथ आ रहे हैं और प्रयाग तक आ पहुँचे हैं।
तुम भरत की मुखमुद्रा पर ध्यान देना कि यह समाचार सुनकर उनको कैसा लग रहा है। तुम उनके मन की बात जानने का प्रयत्न करना। सत्ता बहुत-से लोगों का मन बदल देती है। यदि दीर्घकाल तक शासन करने के बाद भरत के मन में राज्य के प्रति मोह उत्पन्न हो गया हो और वे स्वयं चिरकाल तक राज्य पाना चाहते हों, तो मैं उस राज्य को नहीं लूँगा और यहीं से वन को लौट जाऊँगा। यदि ऐसा हो, तो तुम शीघ्र लौटकर मुझे सूचना देना।“
यह आदेश पाकर हनुमान जी मानवरूप धारण करके तुरन्त वहाँ से अयोध्या की ओर चल दिये। वे गंगा नदी को पार करके शृंगवेरपुर पहुँवे और वहाँ निषादराज गुह से मिले। फिर उनसे बड़ी सुन्दर वाणी में बोले- ”निषादराज! आपके मित्र श्री राम सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ वन से लौट आये हैं और अभी प्रयाग में हैं। वे आज की रात भरद्वाज मुनि के आश्रम में बिताकर कल वहाँ से अयोध्या के लिए चलेंगे। मैं भरत जी को उनका समाचार देने अयोध्या जा रहा हूँ।“
निषादराज ने इस पर बहुत प्रसन्नता व्यक्त की और हनुमान जी का सत्कार किया। उन्होंने उन्हें अयोध्या जाने का मार्ग समझाया और बताया कि भरत जी अयोध्या के बाहर नन्दीग्राम में मिलेंगे। यह सूचना पाकर हनुमान जी तत्काल अयोध्या की ओर वेग से चल पड़े।
अँधेरा होने से पूर्व ही वे निषादराज द्वारा बताये गये मार्ग से नन्दीग्राम पहुँच गये और वहाँ उन्होंने भरत जी को देखा, जो जटा धारण करके वहाँ रहकर राजकार्य चलाते थे। अपने आने की सूचना देकर वे भरत जी के पास गये और हाथ जोड़कर उनसे कहा- ”देव! आप जिन श्री राम के बारे में चिन्तित रहते हैं, मैं उनका समाचार लाया हूँ। वे अपनी पत्नी सीता जी और भाई लक्ष्मण जी सहित कुशल हैं और आपकी कुशलता पूछ रहे हैं। आप शीघ्र ही उनसे मिलेंगे।“
श्री राम के आगमन का समाचार पाकर भरत जी के हर्ष का पारावार नहीं रहा। वे पूछने लगे- ”भाई! तुमने मुझे बहुत शुभ समाचार दिया है। भैया श्री राम अभी कहाँ पर हैं? वे यहाँ कब आयेंगे?“ हनुमान जी ने बताया- ”राजकुमार! श्री राम आज रात्रि प्रयाग में ऋषि भरद्वाज के आश्रम में विश्राम करेंगे और वहाँ से विमान द्वारा कल प्रातः आपके पास आयेंगे।“ भरत जी ने यह जानकर हनुमान जी का बहुत सत्कार किया और उनके रात्रि विश्राम की व्यवस्था कर दी। इसके साथ ही उन्होंने अयोध्या में सभी माताओं को श्री राम, सीताजी और लक्ष्मण जी के सकुशल लौटने की सूचना भेज दी।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
आश्विन कृ. 3, सं. 2082 वि. (10 सितम्बर, 2025)
