गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

पास थे फिर भी कुछ दूरियांँ रह गई।
बाद मिलने के मजबूरियांँ रह गई।।

दिल की जो बात थी दिल में ही है बसी।
देखने को तो बस कनखियाँ रह गई।।

ज़ख्म दिल का समझ ही न पाए सनम।
बस यही उनमें थी खामियांँ रह गई।।

वो न कुछ कह सके हम न कुछ कह सके।
अनसुनी यूं फकत सिसकियांँ रह गई।।

कहते हम दर्दे दिल उनसे अपना मगर।
कहने को सिर्फ थी फब्तियांँ रह गई।।

— प्रीती श्रीवास्तव

*प्रीती श्रीवास्तव

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