कविता
जिंदगी में जरा-जरा सा मुस्कुराते रहिए
जमाने से अपने गम को छुपाते रहिए
वो दौर कोई और था
जब किसी के दर्द से दर्द होता था
नजर आता था
अपने, पराये सभी के आँखों में
आँसू वफा के
अब वक्त कुछ और है
समय ने ले ली है करवट
दब गई सारी भावनाएं
दिल पत्थर से हुए लोगों के
अब किसी के मौत पर भी
सम्वेदनाएं नहीं बची
पड़ोस के घर से
हँसी ठहाकों की आवाज आती
टीवी,अखबार वाले
चीख-चीख कर
औरत के बलात्कार की
घटना सुनाते
पर लोग सेकण्ड भर में चैनल
बदल लेते
किसकी बेटी किसकी बहु
बेचारी के साथ
किसने ऐसा कुकृत्य किया ?
इतना भी जानने, समझने का
वक्त नहीं लोगों के पास
आँखों में पानी आना तो दूर की बात है
आईए
हमसब मिलकर प्रार्थना करे
बची रहे सम्वेदनाएं
हमारे हृदय के प्रांगण में
और जिंदा रहे इंसानियत।
— बबली सिन्हा वान्या
