मुहब्बत
जैसे अलसुबह मंदिर से आती हुई
घंटियों की झंकार
आरतियों की मधुर मधुर स्वर लहरियां ।
आईने के सामने खड़ी कोई नवयौवना
अपनी खूबसूरती को देख
इतराती इठलाती तितलियों की मानिंद ।
पहाड़ की चोटी से घाटियों की ओर
खरामा खरामा उतरती
गुनगुनी सुनहली सर्दी की धूप।
हृदय की घाटियों से फूटता हुआ
निर्मल निश्छल अनवरत
बहता हुआ जैसे लोकगीत का सोता ।
मलयानिल में मद्धम मद्धम भीगी भीगी
भंवरों की गुंजन लिए
महकते हुए शोख फूलों की सुगंध ।
आंखों की भाषा को पढ़ती गुनती
ध्वनियों से ही स्वत:
क्लिष्ट शब्दों के सारे अर्थ खोलती मेधा।
परिंदों की मानिंद जीवन के आंगन में
फुदकती चहचहाती
दुनिया की सरहदों की सारी हदें फलांगती।
बच्चों की तोतली जुबान से झरती
इंद्र धनुषी रंगशाला
दुनिया के तमाम प्रपंचों से बची हुई ।
जीवन को जीवन की तरह गढ़ती
पल पल संवारती
दर्द दुनिया की खूबसूरत शय है मुहब्बत।
— अशोक दर्द
