ग़ज़ल
हमें ही वहम था- मुहब्बत हुयी है
ये किसको ख़बर थी, फ़कत दिल्लगी है।
मुहब्बत को तुमने फक़त खेल समझा
कभी उससे की तो कभी इससे की है।
हमें खा रही है तुम्हारी जुदाई,
तुम्हें भी कमी क्या हमारी खली है?
कभी चांद से रात भर बात की थी,
अभी ज़िंदगी ये अमावस हुई है।
करम करने वाले सितम कर रहे हैं,
यही ज़िंदगी है तो क्या ज़िंदगी है।
— गुंजन अग्रवाल अनहद
