लघुकथा- कौन अच्छा
“दादा जी, बरसात रुक नहीं रही, बाढ़ आ रही है, हम यहाँ मचान पर बिना खाये-पिये फंसे हुए हैं, अब क्या होगा?”
“कुछ नहीं होगा बचवा, एक बार ऐसे ही पहले भी बाढ़ आई थी. तेरी दादी को तो बहाकर ले गई थी, लेकिन हमें जमीन का अच्छा-खासा मुआवजा मिल गया था!”
“मुआवजा क्या होता बाबा?”
“तू नहीं समझेगा बचवा, पर उसी पैसे से पक्का घर बनवा लिया था!”
“पक्का घर! पर मैंने तो पक्का घर देखा ही नहीं!”
“वो तो तभी बेचकर झुग्गी बनाकर बैठ गए थे, अब फिर बाढ़ उतरेगी तो मुआवजा मिलेगा!”
दादा जी के चेहरे पर तो भूख-प्यास, दुःख-तकलीफ की कोई शिकन नहीं थी, पर भूख-प्यास से व्याकुल पोता समझ नहीं पा रहा था कि बाढ़ अच्छी है या मुआवजा या भूख-प्यास!
— लीला तिवानी
