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विजयादशमी व दशहरा अलग अलग त्योहार

हम सनातनी हिन्दुओं के लिये दशहरा और विजयादशमी दोनों ही बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार हैं।जैसा हम सभी जानते ही नहीं बल्कि दोनों, विजयादशमी व दशहरा त्योहार एक ही दिन मनाते हैं क्योंकि दोनों ही पर्व एक ही दिन पड़ते हैं।जबकि दोनों अलग-अलग त्योहार हैं, लेकिन अधिकांश लोगों द्वारा समुचित जानकारी के अभाव में विजयादशमी और दशहरे को एक ही मान लिया जाता है। उसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि दोनों ही त्योहार दस दिनों तक मनाये जाते हैं और दसवें दिन इनका समापन होता है।

भले ही दशहरा और विजयादशमी एक साथ अर्थात एक ही vicisthदिन को पड़ते हैं, किन्तु, दोनों के मनाने की वजह एकदम अलग-अलग है क्योंकि दोनों अलग-अलग कालखण्ड में घटित घटनाओं के कारण मनाये जाते हैं और तो और दोनों के मनाने के तरीके भी अलग अलग हैं। अब अलग-अलग कालखण्ड में घटित घटनाओं के साथ-साथ इन दोनों त्योहार के मनाने की वजह इस प्रकार है –

अब सबसे पहले दशहरे पर्व के बारे में जान लें – जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रभु श्रीराम अपने पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए चौदह वर्षों के लिए वनवास को स्वीकार किया। वनवास जाते समय अनेक कारणों से उनके साथ उनकी धर्मपत्नी माता सीता और अनुज लक्षमण भी साथ गए। जैसा हम सभी जानते हैं वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम ने कई स्थानों का भ्रमण किया और फिर एक जगह कुटिया बना कर रहने लगे।इसी बीच लंकापति रावण छल से माता सीता को उस स्थल से अपहरण करके अपने महल में स्थित अशोक वाटिका में ले गया।

प्रभु श्रीराम ने सीतामाता को बहुत खोजा और कई लोगों से सहायता ली। तथा, अन्त में पवनपुत्र हनुमानजी ने माता सीता का पता लगाया।तदुपरान्त प्रभु श्रीरामजी ने वानर सेना की सहायता से समुद्र पर पुल बनाया और लंका पर आक्रमण कर दिया। लंकापति रावण के साथ प्रभु श्रीराम को नौ दिनों तक भयंकर युद्ध करना पड़ा । अंततः प्रभु श्रीराम ने आश्विन मास की दसवीं तिथि को अधर्मी रावण का वध कर दुनिया को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई। इस प्रकार हम सनातनी हिन्दू प्रभु श्रीराम के इसी जीत के उपलक्ष्य में हर साल दशहरा मनाते आ रहे है।

दूसरी तरफ…. विजयादशमी भी हम सनातनी हिन्दुओं का एक अति महत्वपूर्ण त्योहार है और यह भी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तारीख को ही पड़ता है। विजयादशमी पर्व भी असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है तथा, यह भी दस दिनों तक चलने वाला त्योहार है हालाँकि इसमें शुरू के नौ दिनों को नवरात्र और दसवें दिन को विजयादशमी कहते हैं।

पौराणिक कथाओं के मतानुसार एक बहुत ही अधर्मी महिषासुर नाम का असुर राजा हुआ करता था, जिसे ब्रह्मा से प्राप्त वरदान की वजह से देवता समेत कोई भी उसे मार नहीं सकता था। अपनी इसी क्षमता और शक्तियों के बल पर उसने देवताओं को हराकर इंद्रलोक तक अपना आधिपत्य हासिल कर लिया था। वह अपनी शक्ति के कारण समस्त पृथ्वीलोक पर भी अपना अधिकार चलाने लग गया था।

चूँकि महिषासुर अत्यंत ही अत्याचारी राजा था जिस कारण लोग उसके अत्याचार से त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे थे। आख़िरकार त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने अन्य देवताओं की सहायता से अत्याचारी महिषासुर के अत्याचार से सबको मुक्ति दिलाने के लिये एक शक्ति की रचना की और इसी शक्ति का नाम देवी भगवती (दुर्गा) पड़ा।

देवी दुर्गा को अत्याचारी महिषासुर से नौ दिन तक लगातार भीषण युद्ध करना पड़ा लेकिन दसवें दिन देवी, जिनमें सभी देवताओं की शक्तियाँ समाहित थीं, उस अत्याचारी महिषासुर का वध किया और संसार को उसके आतंक और अत्याचार से मुक्ति दिलाई। इसी जीत के उपलक्ष्य में हर साल देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और इस त्यौहार को “विजयादशमी” कहा जाता है।

विजयादशमी में…. पूरे दस दिनों तक त्योहार मनाया जाता है जिसमे शुरू के नौ दिनों तक देवी की पूजा अर्चना की जाती है एवं, दसवें दिन उन मूर्तियों का किसी नदी में विसर्जन करा दिया जाता है। कई लोग इन नौ दिनों तक व्रत रखते हैं जिसमें हमारे सर्वप्रिय योगी जी और मोदी जी भी हैं। नवरात्र के नवें दिन नौ [९] कुँवारी कन्याओं को देवी स्वरूपा मानकर उनकी पूजा की जाती है एवं उन्हें वस्त्र व geराह प्रदान कर भोजन कराया जाता है।

विजयादशमी को शक्ति पूजा भी कहते हैं और इस दिन शस्त्र पूजा भी की जाती है। सनातनी परिवारों में – समाज में – संस्थाओं में आज शस्त्र पूजन का आयोजन पूरे हर्षोल्लास से होता आया है। कुछ जगहों पर विस्मृत हो रही इस प्रथा को स्मरण में लाने की महती आवश्यकता है। शस्त्र पूजन हमारे आत्म गौरव, आत्म बल का पोषक है । क्योंकि, कहा जाता है कि प्रभु श्रीरामजी ने भी दशानन रावण का वध करने के पहले इस दिन देवी शक्ति की पूजा की थी और उनसे आशीर्वाद लिया था।

अगर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में बात की जाए तो विजयादशमी की घटना पहले हुई है और दशहरे की घटना बाद में। शायद इसी कारण से दुर्गा पूजा के नवरात्र के बाद हमलोग दशहरा मनाने लगते हैं! इस तरह यह सर्वथा सत्य है कि विजयादशमी और दशहरा दोनों ही असत्य पर सत्य की विजय एवं बुरी शक्तियों पर अच्छी शक्ति की विजय का ही त्योहार है। और, ये दोनों ही त्योहार हमें ये सीख भी देते हैं कि तात्कालिक तौर पर बुरी शक्तियाँ चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो जाये लेकिन उनका विनाश निश्चित है। इसीलिए, अभी वर्तमान समय में भी, जो भी बुरी शक्तियाँ खुद को काफी शक्तिशाली और अजेय समझ बैठी है उन्हें विजयादशमी एवं दशहरे से ये सीख जरूर ले लेनी चाहिए।

अब आखिर में सभी सनातनी हिन्दू मित्रों को विजयादशमी एवं दशहरे की हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ अशेष शुभकामनाये।

— गोवर्द्धन दास बिन्नानी “राजा बाबू”

गोवर्धन दास बिन्नानी 'राजा बाबू'

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