चूल्हा
चूल्हा जब -जब जलता है,
जाने क्या -क्या पकता है।
माँ के जैसा कोई नहीं है,
लगता कब से सोई नहीं है।
हर पल दिमाग में उसके चले,
स्वादिष्ट भोजन परिवार को मिले।
ढेरों व्यंजन यूँ बनाना वो चाहे ,
सबको प्रेम से खिलाना वो चाहे।
ममता की छांव में बैठा करो कभी,
हाथ के छालों पर मरहम करो कभी।
जब वो बूढ़ी हो जाती है इक दिन,
अकेले नहीं कर पाती कुछ तुम बिन।
उसका सहारा यूँ फिर तुम बन जाना ,
बस स्वाभिमान को न ठेस पहुंचाना।
— कामनी गुप्ता
