कविता

फर्ज निभाया या आइना दिखाया

कल आधी रात 

मेरे मन में एक सवाल आया,

अबिलंब यमराज को फोन लगाया,

तत्काल हाजिर होने का आदेश सुनाया।

बेचारा नींद में ही दौड़ता हुआ आया 

और हाथ जोड़कर पूछने लगा-

कहो प्रभु! आधी रात को आखिर 

कौन सा ऐसा सवाल है,

जिसके लिए आपने मुझे तत्काल बुलाया।

मैंने यमराज को पास बैठने का इशारा किया 

और खुद भी उठकर बैठ गया,

उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर बोला-

मेरे लिए तो सवाल ही मुश्किल है 

जिसका उत्तर भी सिर्फ तेरे ही पास है।

खीझते हुए यमराज बोला-प्रभु!पहेलियाँ मत बुझाओ 

अपना सवाल तो सामने लाओ,

आपका तो पता नहीं, 

पर मेरी नींद से दुश्मनी तो न निभाओ।

मैंनें कहा -यार अब तू भी मेरा उपहास करेगा 

या मेरा सवाल सुनकर उत्तर भी देगा।

तो ध्यान से मेरा सवाल सुन और सोच समझकर उत्तर दे

क्या हर प्राणी की आत्मा तेरे साथ चुपचाप चल देती हैं?

कोई विरोध, झगड़ा-झंझट, वाद-विवाद नहीं करती हैं ?

और बड़ी शराफत से तेरे साथ हो लेती हैं?

यमराज मासूमियत से कहने लगा-

प्रभु! रोजी रोटी का सवाल है 

जीने के लिए जाने क्या -क्या सहना पड़ता है।

सच तो यह है कि हर एक आत्मा हमें गुमराह करती है 

अभी नहीं के तरह – तरह के तर्क देती है 

समस्या, विवशता का रोना रोती है 

जैसे भी हो जमकर प्रतिरोध करती हैं,

मारपीट ही नहीं कत्ल तक की धमकी देती हैं 

कुछ तो नौकरी चाट लेने की औकात दिखाती हैं 

इतना ही नहीं कुछ तो सांसद, विधायक मंत्री तक

बनाने का भी लालच देती हैं।

पर जैसे भी हो सब कुछ सहकर भी

मुझे तो यथा समय उनकी आत्माओं को

लेकर जाना ही पड़ता है,

बच्चों की दाल रोटी की खातिर 

हर परिस्थिति से जूझना ही पड़ता है।

पर यह भी सच है कि हर आत्मा ऐसा नहीं करती

जिसका जैसा जीवन चरित्र, आचरण, व्यवहार होता है 

उनकी आत्मा का व्यवहार भी ठीक वैसा ही होता है,

भ्रष्टाचारियों, बेईमानों की आत्माएं तो

मोल-भाव तक करने लगती हैं,

गुमराह करने के नये-नये जाल बुनती हैं।

यमराज की बात सुन मैं हैरान हो गया 

सच कहूँ तो बड़ा परेशान हो गया,

फिर पूछ बैठा – इसका कोई हल नहीं है?

यमराज रुँआसा हो कहने लगा

है न प्रभु! ईडी, सीबीआई जैसा मुझे भी 

अधिकार मिलना चाहिए,

मेरी एक नोटिस पर आत्माओं को 

बिना हील-हुज्जत के मेरे पास आ जाना चाहिए।

पर मेरे आवेदन पर विचार ही नहीं हो रहा,

विचार होगा भी तो कैसे?

जब फाइल ही आगे नहीं बढ़ रही है,

और फाइल बढ़ेगी भी कैसे?

जब मेरे आवेदन पर विचार कर 

निर्णय लेने वाली आत्माएं भी 

जीवन भर यही सब कर रही थीं,

बिना घूस लिए एक भी फाइल आगे नहीं बढ़ाई थी,

यमलोक में भी उनकी आदतें नहीं छूट रही हैं

मगर इसमें उन बेचारों का क्या दोष है 

आखिर इनकी चमड़ी तो आज भी उतनी ही मोटी है।

वैसे भी आपकी दुनिया का तो कुछ हो नहीं सकता

कुछ नया रंग दिखेगा, ये मुझे बिल्कुल भी नहीं लगता,

पर एक सच यह भी है प्रभु!

कि यमलोकी व्यवस्था में कोई परिवर्तन 

फिलहाल होता भी नहीं दिखता,

निकट भविष्य में इसका कोई संकेत भी नहीं मिलता,

और आत्माओं के यमलोक ले जाने की व्यवस्था 

आपके यार यमराज के बिना नहीं चल सकता।

यमराज की बात सुन मैं अवाक रह गया 

धरतीवासियों के यमलोकी कारनामों से हैरान हो गया, 

और पहली बार मेरा सिर 

यार यमराज के आगे सचमुच शर्मिंदगी से झुक गया।

यमराज उठा और बिना कुछ कहे चला गया 

और मैं चुपचाप उसे जाता देखता भर रह गया।

पर एक बात मेरी समझ में नहीं आया 

कि वो मेरी आत्मा अभी अपने साथ क्यों नहीं ले गया?

यार का फ़र्ज़ निभाया या मुझे आइना दिखा गया।

*सुधीर श्रीवास्तव

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