गीत – लहर यहां भी आएगी
राजहंस पांखें फैलाओ ,
लहर यहां भी आएगी
नमी,जमीं पर थिरक रही
हरियल गीत सुनाएगी।
जरा मृदा की खिड़की खोलो
गर्भ -नीर अकुलाते हैं
भीतर की ठंडी धड़कन भी
दहलीजों तक आते हैं ।
तुम मधुमासी भाव जगाना
शीतलता मुस्काएगी
राजहंस पांखें फैलाओ
लहर यहां भी आएगी।
भीतर के भीगे पन्नों में
बारिश के हस्ताक्षर हैं
गर्भ में सांसे अभी हरी है
रिसते पानी के स्वर हैं।
नीलकंठ बन धीरे-धीरे
हवा ‘तपिश’ पी जाएगी
राजहंस पांखें फैलाओ
लहर यहां भी आएगी।
शापित सारे कालखंड
जब टुकड़ों में बंट जाएंगे
नैसर्गिक सौंदर्य देखा तब
गीत परिंदे जाएंगे ।
निर्वाती फिर यही धरा
तपोभूमि बन जाएगी
राजहंस पांखे फैलाओ
लहर यहां भी आएगी।
बिखरेगी फूलों की खुशबू
और भ्रमर रसपान करेंगे
पाषाणों को चूम चूम कर
जल उसका गुणगान करेंगे।
सारस ,बगुले नीड़ बनाना
मीन मीत बन जाएगी
राजहंस पांखे फैलाओ
लहर यहां भी आएगी।
— सतीश उपाध्याय
