कविता

दशहरे का तमाशा और असली रावण

हर साल वही नाटक दोहराया जाता है।
लाखों रुपये खर्च करके विशाल रावण खड़ा किया जाता है,
फिर पटाखों से उसे जला दिया जाता है।
लोग ताली बजाते हैं, “बुराई पर अच्छाई की जीत!” चिल्लाते हैं,
और अगले ही दिन वही लोग ईर्ष्या, लालच और धोखेबाज़ी में डूब जाते हैं।
सोचने की बात ये है की ….
हम ईर्ष्या से पड़ोसी की तरक्की पर जलते हैं,
झूठ से अपने स्वार्थ को पूरा करते हैं,
धोखे से अपनों का विश्वास तोड़ते हैं,
और फिर गर्व से कहते फिरते है की…
“हमने रावण जला दिया!”
सच तो यह है कि रावण मैदान में रहता ही नहीं हैं ,
रावण तो हर गली, हर घर और हर इंसान के भीतर बैठा है।
हम सब लकड़ी घास पेपर से बना पुतला जलाकर अपनी अंतरात्मा को बेवकूफ़ बना लेते हैं।
और कितना आसान है न
रावण बाहर जलाओ, भीतर वाले को पालते रहो।
यह पर्व अब आत्ममंथन नहीं,
बल्कि पाखंड का उत्सव बन गया है।
अगर सच में रावण को हराना है,
तो पटाखों से नहीं,अपने भीतर की जलन और लालच की आग बुझाकर हराना होगा।
वरना हर साल हम बस यही करेंगे।
एक-दूसरे को जलते देखेंगे,
और दशहरे में रावण जलाएँगे।

— सोमेश देवांगन

सोमेश देवांगन

गोपीबन्द पारा पंडरिया जिला-कबीरधाम (छ.ग.) मो.न.-8962593570