स्वाध्याय
वर्तमान युग में शिक्षा का बहुत- बहुत महत्व हैं । वह प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर बनाने की योजनाएं चल रही हैं ।साक्षरता के लिए सरकार द्वारा बहुत प्रयत्न किए जा रहें हैं ।शिक्षा और स्वाध्याय दोनों एक ही बात हैं । ज्ञान दो भागों में बंटा हुआ है- पदार्थ का ज्ञान और आत्मा का ज्ञान । वह दूसरे शब्दों में कहें तो जीविका का ज्ञान और जीवन का ज्ञान हैं । ज्ञान ज्ञान हैं । वह उसके दो आयाम बन गए हैं । लौकिक जीवन को चलाने के लिए ज्ञान जरूरी होता हैं और आत्मा को जानने के लिए भी ज्ञान जरूरी होता हैं । अपने आपको जानने के लिए जो ज्ञान होता हैं, वह स्वाध्याय हैं । विद्यालयों, विश्वविद्यालयों आदि में जों पढ़ाया जाता हैं, वह भी स्वाध्याय हैं । स्वाध्याय का अर्थ हैं अध्ययन, शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति । जो पढ़ा हुआ हैं, उसकी सही से स्मृति करना , पठनीय विषय का मनन करना, उसे दूसरों तक पहुँचाना- ये सारे स्वाध्याय से जुड़े पहलू हैं ।स्वाध्याय का व्यापक अर्थ अनुशीलन हैं । ध्यान भी स्वाध्याय से जुड़ा हुआ हैं ।हम ध्यान और स्वाध्याय को सर्वथा पृथक नहीं कर सकते हैं ।जो ध्यान करने वाला है , उसके लिए स्वाध्याय करना जरूरी हैं । स्वाध्याय और ध्यान दोनों में बहुत गहरा संबंध हैं । उद्देश्य एक ही है सत्य की खोज । स्वाध्याय से ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म क्षीण होते हैं । जब आवरण का क्षय होता है , ज्ञान प्रगाढ़ होता हैं । वर्तमान में अध्ययन का मूल्य बहुत बढ़ गया । कोई भी कहीं जाएगा तो पहला प्रश्न होगा, कहां तक पढ़े हों । आचरण की बात शायद बहुत कम पूछी जाती हैं। शिक्षा की सारी बात जीविकापरक हैं । बिना पढ़े जीविका ही नहीं मिलती । जीविका की बात शिक्षा के साथ जुड़ गईं । क्या उसके साथ जीवन की बात को नहीं जोड़ा जा सकता । जीवन के लिए वह अधिक जरूरी हैं । इस दृष्टि से विचार करें तो स्वाध्याय का मूल्य अधिक समझ में आएगा । आत्मज्ञान के क्षेत्र में कुछ पढ़ने की मनोवृत्ति जागेगी , जीवन की सार्थकता का बोध होगा । वह सार्थकता विकास के उस महातट की और ले जाएगी, जिससे जीवन – निर्माण और व्यक्तित्व- निर्माण की संभावना हो जाएगी ।
— प्रदीप छाजेड़
