ज़रूरत से ज़्यादा सोच भी लक्ष्य से भटका देती है
एक छोटे से गांव का लड़का रयान डॉक्टर बनने का सपना देखता था। वह बेहद होशियार था, लेकिन अध्ययन में एकाग्रता उसकी कमजोरी थी। परिणाम आया तो सारे साथी अच्छे अंकों के साथ पास हो गए, लेकिन रयान असफल हो गया। जिन शिक्षकों ने कभी उसकी प्रशंसा की थी, अब वही निराश थे। यह आलोचना उसके लिए सबसे बड़ी सीख बनी,केवल प्रशंसा या आलोचना की सोच ज़रूरी नहीं, असली ज़रूरत लक्ष्य पर ध्यान और अनुशासन की है। रयान ने खुद को सुधारा, अनुशासन विकसित किया, और अगले साल न सिर्फ पास हुआ, बल्कि टॉप भी किया। अब न आलोचना मायने रखती थी, न प्रशंसा,उसका लक्ष्य ही उसका प्रेरक बन गया।कई बार राह में आलोचना या प्रशंसा हमें या तो रोक देती है या भटका देती है। यदि हम आलोचना से डरकर रुक जाते हैं या प्रशंसा से मदहोश हो जाते हैं, तो लक्ष्य दूर हो जाता है। एक प्रसिद्ध कहानी “Group of Frogs” में देखा गया कि कुछ मेंढक जब पेड़ पर चढ़ने लगे, तो सभी जानवर उन्हें रोकने, आलोचना करने और हतोत्साहित करने लगे। लेकिन एक मेंढक उन सबकी आवाज़ सुन ही नहीं सकता था—वह बहरा था। उसे लगा सब उसे प्रोत्साहित कर रहे हैं, और वह चोटी तक पहुँच गया। सोचने का तरीका लक्ष्य की राह खुद तय करता है।विवेचना यानी सोच-विचार अच्छा है, पर ज़रूरत से ज़्यादा सोच भी लक्ष्य से भटका देती है। जो जीवन में केवल विवेचना में उलझ जाता है, वह अमल तक नहीं पहुँच पाता। अतः अपने लक्ष्य को प्राथमिकता दें, बाकी सब बातों को केवल सीख के तौर पर लें।जो इंसान अपने लक्ष्य को सर्वोपरि मान लेता है, उसके लिए बाहरी राय, आलोचना या प्रशंसा बस शोर रह जाती है। न वे रुकावट बनती हैं, न मंज़िल। असली विजेता वही है, जो सबकी बात सुनता है, पर आगे बढ़ता है अपने लक्ष्य की तरफ। यह कहानी और विचार वास्तविकता के करीब हैं, और हर व्यक्ति को अपने जीवन-संघर्ष में प्रेरित कर सकते हैं।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
