पल भर का तमाशा
रंगीन मेले,
भीड़ में गुम हो जाता,
चेहरा अकेला।
रोशनी झिलमिल,
शोहरत की ऊँची मीनार,
रेत सा ढहती।
तालियों की गूँज,
कल तक थी सिरमौर,
आज खामोशी।
शोहरत की धुन,
सुनहरी परछाइयाँ,
जल्दी मिटतीं।
बुझते दीये से,
सीख लेता है मन भी,
सदा न रहना।
पल भर की चकाचौंध,
शोहरत की बुलन्दी,
पल भर का तमाशा है।
बिखरे सपनों में,
सच्चाई मुस्काती,
धैर्य सिखाती।
हवा के झोंके,
ले जाते हैं यादें भी,
बस रह जाता मन।
क्षणभंगुर जीवन,
तमाशों की भीड़ में,
सत्य खोजता।
–- डॉ. अशोक
